एक राष्ट्रपति जमीन पर और पत्रकार कुर्सी पर

ए पी जे अब्दुल कलाम एक प्रमुख भारतीय वैज्ञानिक थे जिन्होंने 2002 से 2007 तक भारत के 11 वें राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया था। राष्ट्र के नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम और सैन्य मिसाइल विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए, उन्हें भारत के मिसाइल मैन के नाम से जाना जाता था। उन्होंने 1998 में भारत के पोखरन -2 परमाणु परीक्षणों में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसने उन्हें राष्ट्रीय नायक के रूप में स्थापित किया।उनके कार्यकाल के दौरान उन्होंने बेहद लोकप्रिय पीपुल्स राष्ट्रपति के मोनिकर की कमाई की। उन्हें राष्ट्र के अंतरिक्ष और परमाणु कार्यक्रम में उनके योगदान के लिए भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

भारत के राष्ट्रपति और सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिकों में से एक होने के बावजूद, वर्षों से,उन्हें  उनकी सरलता और विनम्रता के लिए जाना जाता है । और उनकी इसी सरलता को दर्शाता हुआ एक किस्सा नीचे विडियो में दिखाया गया है ।  इसमें आप पूर्व राष्ट्रपति को  जमीन पर बैठे राम मन्दिर पर एक सवाल का जवाब देते देख रहे है , जबकि साक्षात्कार लेने वाले उच्च प्रोफ़ाइल पत्रकारों  कुर्सिओं पर बिराजे उनके जवाब का आनंद ले रहे हैं।

बिकाऊ दलाल मीडिया के अहंकार की हद 

यह कलाम साहब का बड़प्पन था जिन्होंने, बिना कुछ सोचे समझे, उसी स्थान को ग्रहण किया जो उनके लिए समय के अभाव के कारण आसान था. मगर इन  बिकाऊ पत्रकारों को अपने राष्ट्रपति के मान का कोई  ख्याल नहीं था । ये महाराजाओं की तरह बिराजमान हुए बैठे थे।  उन्होंने उस वार्तालाप को आगे बढ़ाया ना कि महामहिम को नीचे बैठा हुआ देख खुद नीचे बैठे या उनके सम्मान में खड़े होकर उन्हें बैठने के लिए कहा । एक आम व्यक्ति भी हो तब भी हम उनके सम्मान में कुर्सी से खड़े होते है और ये तो हमारे प्रिय राष्ट्रपति “कलाम द ग्रेट” है।

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ऐसे है इनके विचार और ये देश को जागरूक करने का बीड़ा उठाते है।  ऐसी घटिया सोच वाले पत्रकार क्या किसी को जागरूक करेंगे।बल्कि देश को इनके प्रति जागरूक होने की जरूरत है तांकि देश इनको सबक सिखा सके।खुद को शिक्षित कहने वाले इनकी असभ्यता का इससे बड़ा प्रदर्शन और क्या हो सकता है।यही फर्क है श्रीमान अब्दुल कलाम आजाद मे और बिकाऊ दलाल मीडिया में। ऐसे ही कोई अब्दुल कलाम आजाद नहीं बन जाता। यहां एक बात ध्यान देने योग्य है इंसान महान अपने कर्मों से बनता है ना कि अपने जन्म से. सलाम है कलाम साहब को।

 

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