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‘जनता कर्फ्यू’ से कोरोना पर PM मोदी का वार, याद आया शास्त्री का 55 साल पुराना उपवास

नई दिल्ली। चीन से निकले कोरोना वायरस की मार आज विश्व के करीब 180 देश झेल रहे हैं। सभी प्रभावित देश अपने-अपने तरीके से इससे निपटने की कोशिश कर रहे हैं। भारत में कोरोना की चपेट में आने से अब तक पाँच लोगों की मौत हो चुकी है और 200 से ज्यादा संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं।

इसका प्रसार रोकने के लिए मोदी सरकार तमाम कदम उठा रही है। इसमें से एक जनता जनता कर्फ्यू है। इसकी अपील पीएम नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को देश को संबोधित करते हुए की थी। उनके प्रयासों की चौतरफा सराहना हो रही है। उनके इस कदम ने लोगों के जेहन में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के एक ऐसे ही अनूठे प्रयोग की याद ताजा कर दी है। शास्त्री ने करीब 55 साल पहले इसी तरह देश के लोगों से उपवास की अपील की थी।

1964 में शास्त्री प्रधानमंत्री बने। इसके अगले ही साल भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया। उस समय देश में भयंकर सूखा पड़ा था। खाने-पीने की चीजों को निर्यात किया जा रहा था। यह संकट सरकार के लिए युद्ध से भी बड़ी चुनौती बनकर उभरी। अनाज देने के एवज में अमेरिका अपनी शर्तें थोप रहा था। यह शास्त्री को मॅंजूर नहीं था। ऐसे में अनाज की कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने कई कदम उठाए। इनमें से एक जनता से उपवास की अपील थी।

हालॉंकि जनता से यह अपील करने से पहले उन्होंने इसका प्रयोग अपने ही परिवार पर किया। एक दिन शास्त्री ने घर के सारे सदस्यों को रात के खाने के समय बुलाया और कहा कि कल से एक हफ्ते तक शाम को चूल्हा नहीं जलेगा। बच्चों को दूध और फल मिलेगा और बड़े उपवास रखेंगे। शास्त्री की इस बात का परिवार के सभी सदस्यों ने पूरी तरह से सात दिन तक पालन किया। पूरा सप्ताह बीत जाने के बाद शास्त्री ने एक बार फिर से परिवार के सदस्यों को एक साथ बुलाया और कहा, “मैं सिर्फ देखना चाहता था कि यदि मेरा परिवार एक हफ्ते तक एक वक्त का खाना छोड़ सकता है तो मेरा बड़ा परिवार (देश) भी हफ्ते में कम से कम एक दिन तो भूखा रह ही सकता है।”

इसके बाद शास्त्री ने आकाशवाणी के जरिए देश की जनता से हफ्ते में कम से कम एक बार खाना न पकाने और उपवास रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से देश इतना अनाज बचा लेगा कि अगली फसल आने तक देश में इसकी कमी न हो। शास्त्री की इस मार्मिक अपील देश पर गहरा असर देखने को मिला।

इसके बाद शास्त्री जी का यह कदम देश की राजनीति में भी हमेशा के लिए एक सबक बन गया और आम लोगों को भी अहसास हुआ कि देश हित में आखिर सामान्य व्यक्ति किस तरह से अपनी भागीदारी अदा कर सकता है। गौरतलब है कि शास्त्री जी ने कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए ‘जय जवान जय किसान’ का भी नारा दिया था।

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