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मुश्किल वक्त में डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस के जरिए भारत ने की थी चालबाज चीन की मदद

नई दिल्‍ली। भारत और चीन के बीच गलवन झड़प के बाद से ही वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव है। ऐसे वक्त में रूस- भारत-चीन (आरआइसी) संगठन की वर्चुअल बैठक हुई, जिसमें विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने परोक्ष रूप से अपनी चिंताओं को जता दिया। उन्होंने बैठक में डॉ. कोटनिस की याद दिलाकर चीन को संदेश दिया कि उसके हर संकट में भारत साथ खड़ा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि कौन थे डॉ. कोटनिस जिनके बारे में बताकर भारत ने चीन को उसके मुश्किल वक्त की याद दिलाई है, जिसमें भारत ने मदद की थी। दूसरों की मदद करने की सदियों पुरानी भारतीय परंपरा और रीति रही है। डॉ. कोटनिस की कहानी उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है।

चीनी सैनिकों को बचाने पहुंचे थे चीन : डॉ. कोटनिस का पूरा नाम डॉ. द्वारकानाथ शांताराम कोटनिस था। उनका जन्म महाराष्ट्र के शोलापुर में 10 अक्टूबर 1910 को हुआ। उन्होंने बांबे विश्वविद्यालय से संबद्ध जीएस मेडिकल कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की। उसी वक्त जापान ने चीन पर आक्रमण कर दिया था। जिसमें बड़ी संख्या में चीन के सैनिक मारे जा रहे थे। ऐसे में चिकित्सा मिशन के तहत डॉ. कोटनिस चीन पहुंचे। जहां पर अग्रिम मोर्चों पर घायल होने वाले चीनी सैनिकों की बड़ी संख्या में उन्होंने जान बचाई।

चीन ने लगाई थी गुहार : द्वितीय चीन जापान युद्ध के समय 1938 में चीन के जनरल झू दे ने जवाहरलाल नेहरु से चीन के सैनिकों को चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने की गुहार लगाई। इसके लिए उन्होंने भारतीय चिकित्सकों को भेजने का आग्रह किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने स्वयंसेवक चिकित्सकों के दल के साथ एंबुलेंसभेजने की भी व्यवस्था की। इस एंबुलेंस के लिए 22 हजार रुपये की राशि एकत्रित की गई थी। साथ ही 1938 में पांच चिकित्सकों के दल को चीन भेजा गया। जिनमें डॉ. कोटनिस भी शामिल थे।

चीन में पूजनीय हैं कोटनिस : डॉ. कोटनिस को चीन में अपने जीवनकाल में ही बेहद सम्मान मिला। बाद में उनकी याद में डाक टिकट जारी किए गए और हेबई प्रांत में उनका स्मारक बनाया गया। यहां तक की आज भी चीन के लोग डॉ. कोटनिस का नाम बेहद सम्मान से लेते हैं। 2009 में चीन के एक सदी के दौरान विदेशी मित्रों के इंटरनेट मतदान में कोटनिस को शीर्ष 10 विदेशियों में चुना गया। उनके निधन पर माओ ने कहा था कि सेना ने एक हाथ खो दिया है, देश ने एक दोस्त को खो दिया है। आइए हम हमेशा उनकी अंतरराष्ट्रीय भावनाओं को ध्यान में रखें।

सिर्फ 32 साल की उम्र में निधन : डॉ. कोटनिस का 9 दिसंबर 1942 को निधन हो गया। उस वक्त वे महज 32 साल के थे। हालांकि इस छोटी सी उम्र में ही वे भारत और चीन की दोस्ती के प्रतीक बन चुके थे। गुआ कई बार उनके परिजनों से मुलाकात करने के लिए भारत आती रहीं और हर बार बेहतर यादों के साथ लौटती रहीं। उन्होंने माई लाइफ विद कोटनिस में लिखा है कि भारत के लोग बहुत ही अच्छे हैं और इसके पीछे यहां की संस्कृति और सभ्यता ही है।

दोनों देशों से था प्रेम : डॉ. कोटनिस पांच भारतीय चिकित्सकों के साथ वुहान पहुंचे और चीन के सैनिकों का उपचार शुरू किया। बाद में उन्हें डॉ. बेथून अंतरराष्ट्रीय अस्पताल का निदेशक नियुक्त कर दिया गया। इसी दौरान उन्हें चीन में काम करने वाली नर्स गुआ क्विंग से प्रेम हो गया। 1941 की दिसंबर में दोनों ने शादी कर ली और कुछ समय बाद गुआ ने एक पुत्र को जन्म दिया। भारत और चीन को समान रूप से प्रेम करने वाले डॉ. कोटनिस ने इसका नाम यिनहुआ रखा। यिन का शाब्दिक अर्थ भारत होता है, वहीं हुआ का अर्थ चीन होता है। दोनों देशों के प्रति प्रेम और लगाव की डॉ. कोटनिस की पूरी कहानी उनके द्वारा रखा गया बेटे का नाम कह देता है।

दशकों बाद भी याद हैं कोटनिस : चीन में डॉ. कोटनिस का बेहद सम्मान किया जाता है। भारत में जब भी कोई चीन का राष्ट्रपति या अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति आता है तो वो डॉ. कोटनिस के रिश्तेदारों से मिलना कभी नहीं भूलता है। चाऊ एन लाई, जियांग जेमिन, हू जिंताओं से लेकर शी जिनपिंग तक यह सूची बहुत लंबी है। चीन के लगभग हर शीर्ष नेता ने डॉ. कोटनिस के परिवार से मुलाकात की जो उनकी चीन में अहमियत को बताता है।

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