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हार पर हार, बागियों के वार… सोनिया की इमरजेंसी मीटिंग के पीछे हैं ये पांच वजह

नई दिल्ली। कांग्रेस के अंदर काफी वक्त से चली आ रही अंतर्कलह को खत्म करने के लिए पार्टी ने कवायद शुरू कर दी है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शनिवार को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की बैठक बुलाई है. किसान आंदोलन के बीच बुलाई गई इस बैठक में मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के लिए रणनीति बनाई जाएगी, जिसमें कांग्रेस के उन नेताओं को भी बुलाया गया है जिन्होंने चार महीने पहले सोनिया गांधी को चिट्टी लिखकर पार्टी नेतृत्व पर सवाल खड़े किए थे. ऐसे पांच कारण हैं, जिसके चलते सोनिया गांधी को बैठक बुलाने के लिए मजबूर होना पड़ा है, जिसमें गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा और शशि थरूर जैसे असंतुष्ट नेताओं को भी बुलाया गया है.

1. चुनाव में कांग्रेस को मिलती मात
कांग्रेस को एक के बाद एक चुनावों में मिलती हार से गांधी परिवार पर सवाल खड़े होने लगे थे. बिहार विधानसभा चुनावों से लेकर देश के कई राज्यों में हुए उपचुनाव में कांग्रेस को करारी हार मिली है. हैदराबाद, गोवा और केरल में स्थानीय निकाय चुनाव में ही नहीं बल्कि सत्ता पर काबिज होने के बाद राजस्थान पंचायत चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है. केरल की हार से तो कांग्रेस की सत्ता में वापसी की उम्मीदों पर संकट के बादल छा गए हैं. तेलंगाना में कांग्रेस का वोटबैंक पूरी तरह से बीजेपी में शिफ्ट हो गया है, जिसके चलते पार्टी के लिए मुश्किलें और भी बढ़ गई हैं.

2. असंतुष्ट नेताओं का सम्मान
सोनिया गांधी ने बैठक में उन नेताओं को भी बुलाया है, जिन्होंने पार्टी नेतृत्व पर सवाल खड़े किए थे. सोनिया गांधी असंतुष्ट नेताओं से मुलाकात कर एक संदेश देना चाहती हैं कि कांग्रेस गांधी परिवार के वफादारों का ही नहीं बल्कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का सम्मान करती है. अगस्त में कांग्रेस के जिन 23 नेताओं ने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर स्थाई अध्यक्ष और संगठन का चुनाव कराने का सुझाव दिया था. इसके बाद पार्टी में काफी घमासान मच गया था. इस बैठक के जरिए असंतुष्ट नेताओं को साधने का दांव माना जा रहा है. सूत्रों की मानें तो असंतुष्ट नेताओं के नेताओं की फेहरिश्त 23 से घटकर जी-5 हो गई है, जिसमें गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल मनीष तिवारी और शशि थरूर शामिल हैं.

कांग्रेस इस बैठक के जरिए एकजुटता का संदेश और सामूहिक नेतृत्व में विश्वास करने वाली पार्टी के तौर पर खुद को पेश करना चाहती है. यही वजह है कि यह वरिष्ठ नेताओं के साथ मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य पर मंथन के लिए असंतुष्ट नेताओं को भी बुलाया गया है, जो एक तरह से साझा मंच होगा. इस बैठक में गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा शशि थरूर जैसे नेताओं को न्योता भेजा गया है. कांग्रेस पर अक्सर सवाल उठाया जाता कि पार्टी के सारे फैसले गांधी परिवार में होते हैं. ऐसे में इस बैठक के जरिए यह बताने की कोशिश है कि कांग्रेस एक लोकतांत्रिक पार्टी है और सारे फैसले किसी एक व्यक्ति के द्वारा नहीं बल्कि सर्वसम्मति के साथ लिए जाते हैं. कांग्रेस की ऐसी छवि पेश करने की है, जिसके लिए गांधी परिवार के वफादार और असंतुष्ट दोनों खेमों को बुलाया गया है.

4. कांग्रेस में संगठनात्मक चुनाव 
कांग्रेस की यह बैठक इसीलिए भी काफी अहम है कि अगले साल जनवरी-फरवरी में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव कराया जाना है. अगस्त के महीने में कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में तय हुआ था कि छह महीने के अंदर चुनाव करा लिए जाएंगे. ऐसे में सोनिया गांधी भी इस बात पर अडिग है कि समय से पार्टी अध्यक्ष के चुनाव कराए जाएं. मतदाता सूची को संकलित करने की कवायद पूरी हो गई है और पार्टी से उम्मीद की जा रही है कि वह जल्द ही नए पार्टी अध्यक्ष का चुनाव करने के लिए पूर्ण सत्र की तारीखों की घोषणा करेगी. पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों में जिनमें यह माना जा रहा था कि राहुल गांधी पार्टी का नेतृत्व के लिए तैयार हो जाएंगे. ऐसे में असंतुष्ट नेताओं को राहुल के नाम पर सहमति के लिए राजी करना होगा.

5- कांग्रेस स्थापना दिवस से पहले एकमत 
सोनिया गांधी की यह बैठक 136 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी के स्थापना दिवस से पहले हो रही है. 28 दिसंबर को स्थापना दिवस से पहले कांग्रेस पार्टी के अंदर सारे गिले-शिकवे दूर करना चाहती है, इसीलिए पार्टी ने 9 दिन पहले बैठक बुलाई है. गांधी परिवार एक बड़ा संदेश देना चाहता है कि संकट की घड़ी में भी पार्टी एकजुट है. वरिष्ठ नेताओं द्वारा विचार-मंथन आगामी राजनीतिक लड़ाई के लिए कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक पुनरुद्धार और रोड मैप के एजेंडे को निर्धारित करेगा. कांग्रेस की वापसी एकजुटता से ही हो सकती है.

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