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म्यांमार: कौन हैं ‘चिल्ड्रन ऑफ़ गांधी’ कही जाने वाली आंग सान सू जिन्हें सेना ने किया गिरफ्तार

म्यांमार में जिसका डर था आखिरकार वही हुआ. सेना ने बीते साल (2020) नवंबर महीने में हुए आम चुनाव में धांधली का आरोप लगाते हुए चुनी हुई सरकार का तख्तापलट कर दिया और सत्ता पर कब्जा कर लिया. इसके फौरन बाद वहां की प्रमुख नेता आंग सान सू की और राष्ट्रपति विन म्यिंट को सेना ने हिरासत में लेते हुए एक साल के लिए इमरजेंसी का ऐलान कर दिया. लोग सेना के इस फैसले के खिलाफ प्रदर्शन ना कर सकें इसलिए पूरे देश में सैनिकों की तैनाती कर दी गई है. अब म्यांमार में सत्ता सेना के कमांडर-इन-चीफ मिन आंग ह्लाइंग के पास चली गई है.

म्यांमार में इमरजेंसी लागू

ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिरकार वहां की सबसे बड़ी नेता आंग सान सू कौन हैं जिनको हटाकर सेना ने सत्ता पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है और उन्हें हिरासत में ले लिया है. म्यांमार की प्रमुख नेता आंग सान सू का जन्म 19 जून 1945 को यंगून में हुआ था. 1964 में दिल्ली विश्वविद्यालय और 1968 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद, उन्होंने तीन वर्षों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में काम किया. उन्होंने 1972 में माइकल आरिस नाम के शख्स से शादी की और उनके दो बच्चे हैं.

म्यांमार में इमरजेंसी लागू

वो एक राजनयिक और लेखक होने के बाद म्यांमार की राजनेता बनी थीं. उन्हें साल 1991 में नोबेल शांति पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है. आंग सान सू ने 2016 से 2021 तक म्यांमार के स्टेट काउंसलर के रूप में काम किया. नेशनल लीग ऑफ़ डेमोक्रेसी के नेता और पहले स्टेट काउंसलर के रूप में उन्होंने देश की सरकार में अहम भूमिका निभाई.

म्यांमार में इमरजेंसी लागू

म्यांमार में स्टेट काउंसलर के पद को प्रधानमंत्री के समकक्ष माना जाता है. बता दें कि 1962 से लेकर साल 2011 तक देश में रहे ‘मिलिट्री जनता’ को खत्म कर आशंकि लोकतंत्र को बहाल करने में उन्होंने बेहद अहम भूमिका निभाई थी. हालांकि 1 फरवरी 2021 को तख्तापलट के बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया और पद से हटा दिया गया है.

म्यांमार में इमरजेंसी लागू

आंग सान सू की 1988 के विद्रोह में प्रमुखता से उभरीं और नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) की महासचिव बनीं, जो उन्होंने सेना के कई सेवानिवृत्त अधिकारियों की मदद से बनाई थी. इन लोगों ने सैन्य शासन की आलोचना की थी. 1990 के चुनावों में, एनएलडी ने संसद में 81% सीटें जीतीं, लेकिन परिणाम शून्य थे, क्योंकि सेना ने सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप बड़ा अंतर्राष्ट्रीय हंगामा हुआ.

म्यांमार में इमरजेंसी लागू

हालांकि, चुनाव से पहले ही उन्हें घर में नजरबंद कर दिया गया था. वह 1989 से 2010 के बीच लगभग 21 साल तक 15 अन्य लोगों के साथ दुनिया की सबसे प्रमुख राजनीतिक कैदियों में से एक रही. 1999 में, टाइम मैगज़ीन ने उन्हें “चिल्ड्रन ऑफ़ गांधी” और म्यांमार के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी का नाम दिया. बता दें कि आंग सान सू महात्मा गांधी के विचारों से बेहद प्रभावित थीं.

म्यांमार में इमरजेंसी लागू

उनकी पार्टी ने 2010 के चुनावों का बहिष्कार किया, जिसके परिणामस्वरूप सैन्य समर्थित यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी को निर्णायक जीत मिली. आंग सान सू की पार्टी की पियथु हलुताव सांसद बनीं. इसके बाद उनकी पार्टी ने 2012 के उपचुनावों में 45 खाली सीटों में से 43 सीटें जीती थीं. 2015 के चुनावों में, उनकी पार्टी ने शानदार जीत हासिल की, उनके यूनियन ने विधानसभा में 86% सीटों पर जीत दर्ज की.

म्यांमार में इमरजेंसी लागू

आंग सान सू को जीत के बाद भी वहां के संविधान में वर्णित व्यवस्थाओं के कारण राष्ट्रपति बनने से रोक दिया गया था क्योंकि उनके दिवंगत पति और बच्चे विदेशी नागरिक थे. इसके बाद आंग सान सू के लिए राज्य काउंसलर की नई भूमिका बनाई गई और उनका पद प्रधानमंत्री के समकक्ष था. वो वहां की लोकतांत्रिक सरकार में सबसे अहम भूमिका निभा रही थीं.

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