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अखिलेश यादव का नया वर्जन और बीजेपी मॉडल पर सपा…2022 में झटके के बाद 2024 के लिए ये तैयारी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में सपा 111 विधायकों के साथ भले ही मुख्य विपक्षी दल हो, लेकिन 2024 की चुनावी राह उसके लिए काफी मुश्किल भरी है. शिवपाल यादव से लेकर ओम प्रकाश राजभर तक अलग हो चुके हैं तो आजमगढ़ और रामपुर सीटें भी हाथ से निकल गई हैं. इस बात को बाखूबी समझते हुए सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए अपनी चाल और अंदाज ही नहीं बल्कि अपने मोहरे और दांव भी बदल दिए हैं. बीजेपी के फॉर्मूले से बीजेपी को मात देने की कवायद में अखिलेश यादव इन दिनों जुट गए हैं.

2024 के लोकसभा चुनाव के लिए भले ही करीब 20 महीनों का वक्त है, लेकिन सपा ने अपनी तैयारी शुरू कर दी है और अखिलेश यादव मिशन मोड में आ चुके हैं. सहयोगियों के साथ छोड़ने और शिवपाल के बगावती तेवर के बाद अखिलेश ने अपनी सियासी चाल बदल दी है. वो पहली बार बिना चुनाव के तीन दिनों तक लखनऊ से बाहर यूपी के दूसरे जिलों का दौरा करते रहे. इस दौरान विभिन्न जिलों में बीजेपी की खामियां गिनाते नजर आए तो दूसरी तरफ अपनी सियासी ताकत की थाह भी ले रहे थे.

बीजेपी के नक्शेकदम पर सपा

बीजेपी ने मिशन-2024 के लिए यूपी में सीएम योगी से लेकर केशव मौर्य और बृजेश पाठक सहित सभी दिग्गज नेताओं को जिम्मा सौंप रखा है. पार्टी के ये सभी नेता जिले-जिले दौरे करके माहौल बना रहे हैं. बीजेपी के इसी फॉर्मूले पर सपा भी चल रही है. सपा ने अपने विधायक और सांसदों सहित वरिष्ठ नेताओं को जिले स्तर पर प्रभार सौंप रखा है, जिनके कंधों पर पार्टी सदस्यता बढ़ाने से लेकर नगर निकाय चुनाव तक का भार दे रखा है. पार्टी के ये सभी नेता अपने-अपने क्षेत्र में डेरा जमा रखे हैं और सपा का कुनबा बढ़ाने में जुटे हैं.

अखिलेश ने दिए भविष्य के संकेत

वहीं, सीएम योगी की तर्ज पर अखिलेश यादव ने भी अपना यूपी भ्रमण शुरू कर दिया है. कन्नौज और आजमगढ़ दौरे के बाद अखिलेश यादव तीन दिनों तक लखनऊ से बाहर पश्चिमी यूपी की सियासी थाह लेते नजर आए. पहले नोएडा फिर मथुरा होते हुए और उसके बाद औरैया पहुंचे, जहां वो चुनावी अंदाज में जनसभा संबोधित करते नजर आए.

इसके बाद लखनऊ पहुंचते ही जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाकर अपनी भविष्य की रणनीति भी साफ कर दी है. मंगलवार को ‘भागीदार का संघर्ष’ पुस्तक का विमोचन करते हुए कहा कि समाज में अभी भी दलित-वंचितों के साथ भेदभाव किया जा रहा है और जब भी हमारी सरकार आएगी हम जातिगत जनगणना जरूर करवाएंगे.

नोएडा से मथुरा तक अखिलेश का दौरा

अखिलेश यादव ने शनिवार को नोएडा के सेक्टर-121 के गढ़ी चौखंडी गांव में स्थित स्वर्गीय रघुवर प्रधान की प्रतिमा का अनावरण किया. इस मौके पर अखिलेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ही प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी जमकर तंज कसा. इसके बाद अखिलेश यादव रविवार को अपने कुल देवता भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा पहुंचे, जहां उन्होंने बांके बिहारी मंदिर सहित कई मंदिरों में दर्शन कर सियासी संदेश देने की कवायद की.

सीएम योगी बनाम अखिलेश

दिलचस्प बात यह है कि अखिलेश यादव का लखनऊ से बाहर का दौरा उसी समय हुआ है जब सीएम योगी पश्चिमी यूपी में थे. इस दौरान सीएम योगी ने मेरठ से लेकर गाजियाबाद और बुलंदशहर तक में विकास की सौगात से नवाजा था. इतना ही नहीं बीजेपी ने प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी और महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह को नियुक्त किए हैं. पार्टी के दोनों ही नेता पश्चिमी यूपी से हैं. सियासी समीकरण के लिहाज से भी देखें तो एक जाट और एक सैनी समुदाय से हैं.

वहीं, अखिलेश यादव ने बीजेपी की सक्रियता को देखते हुए पश्चिमी यूपी में अपनी एक्टिवनेस बढ़ा दी है. इसी कड़ी में उन्होंने पश्चिमी यूपी के नोएडा और मथुरा को दौरा किया. इसके बाद लखनऊ वापसी से पहले औरैया पहुंचे. इस दौरान अखिलेश ने गांव, गरीब और युवाओं को साधने की कोशिश की. युवाओं से जुड़े मुद्दे को बार-बार दोहराते दिखे तो डॉ. लोहिया के साथ डॉ. अंबेडकर को भी जोड़ा और संविधान बचाने की दुहाई दी. इस तरह अपने सामाजिक समीकरण को बनाने की कोशिश की तो दलित वोटों को भी सियासी संदेश दिया.

मिशन-2024 का क्या प्लान

2022 विधानसभा चुनाव में सत्ता से दूर रहने के बाद सपा को लोकसभा उपचुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा है. ऐसे में 2022 के सहयोगी रहे सुभासपा, महान दल ने अखिलेश यादव पर कई तरह के आरोप लगाते हुए और गठबंधन से नाता तोड़ लिया है तो शिवपाल यादव ने भी सपा से किनारा कर लिया है. सूबे के इस बदले हुए सियासी माहौल में बीजेपी ने 2024 के चुनाव में 80 में से 75 प्लस सीटें जीतने का टारगेट रखा है. ऐसे में सपा के लिए अपनी जीती हुई सीटों को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है, जिसके चलते अखिलेश यादव ने खुद मोर्चा संभाल लिया है.

चाट खाते अखिलेश यादव

संगठन से समीकरण तक दुरुस्त

2024 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए सपा ने अपनी संगठनात्मक इकाइयां भंग कर नए सिरे से पुनर्गठन की तैयारी शुरू कर दी है.सपा का सदस्यता अभियान एक तरफ जोरों से चल रहा है तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव ने सूबे का दौरा शुरू कर दिया है. सपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि 2024 के लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले कई बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे. संगठन में बड़ा फेरबदल होना है, जिसे अक्टूबर तक हर हाल में कर लिया जाएगा. प्रदेश अध्यक्ष को लेकर भी नए नामों पर विचार-मंथन चल रहा है ताकि सामाजिक समीकरण को और भी मजबूत बनाया जाए.

अखिलेश यादव ने सूबे की सियासी नब्ज को समझने के लिए अपने जो दौरे शुरू किए हैं, उसे चुनाव तक लगातार जारी रखेंगे. 2024 से पहले वो बारी-बारी से हर जिले में जनसभा करेंगे और लोगों की समस्याएं उठाएंगे ताकि बीजेपी के खिलाफ माहौल बन सके. ऐसा करके अखिलेश यादव उन आरोपों का जबाव देने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें विपक्षी अक्सर कहते हैं कि वो एसी कमरे से बाहर नहीं निकलते हैं. इसके अलावा जमीनी रूप से सक्रिय रहकर यूपी में बीजेपी के सामने किसी और दल को खड़े होने नहीं देना चाहते हैं.

उपचुनाव के बाद मायावती ने जिस तरह से कहा है कि सपा के बस की बात नहीं है कि बीजेपी को हरा सके. यही वजह है कि अखिलेश यूपी में बीजेपी बनाम सपा के इर्द-गिर्द ही चुनाव को रखना चाहते हैं. इसीलिए अखिलेश ने अपने दौर में कहा कि कई दल सिर्फ वोट काटने के लिए हैं. नोएडा, मथुरा और औरैया में जिस तरह से वो आम लोगों से मिले, कुल्हड़ में चाय पी, सामान्य दुकान पर चाट खाई और डेयरी में जाकर दूध, दही, माठे पर जीएसटी लगाए जाने का मुद्दा उठाया है. यह घटनाक्रम अनायास नहीं है बल्कि इसके सियासी निहितार्थ भी हैं. इसे प्रदेश के सियासी हालात पर नजर रखने वाले लोग सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की सक्रियता को सपा के भविष्य की रणनीति के तौर पर देख रहे हैं.

हार से नहीं लिया सबक

अखिलेश यादव भले ही संगठन से लेकर समीकरण तक को दुरुस्त करने में जुटे हैं, लेकिन हार से अभी तक अखिलेश ने सबक नहीं लिया. 2022 के चुनाव में मिली हार के लिए जिन्हें जिम्मेदार ठहराया गया, उन पर अभी तक न तो कोई कार्रवाई की गई और न ही उन्हें पद से हटाया गया. अखिलेश यादव के सबसे करीब जिन नेताओं को माना जाता है, वो तमाम नेता अपने बूथ पर भी सपा को नहीं जिता सके.  इसके बावजूद अखिलेश यादव ने फिर से उन्हें सदस्यता अभियान की जिम्मेदारी दे रखी है, जिसके चलते सपा का एक बड़ा तबका जरूर नाराज है. ऐसे में अखिलेश भले ही नए वर्जन में दिख रहे हों, लेकिन इसका इलाज किए बिना कैसे मर्ज को ठीक कर पाएंगे?

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