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हरियाणा में भी कांग्रेस का होगा पंजाब जैसा हाल! भूपिंदर सिंह हुड्डा के रवैये ने उठा दिए सवाल

हरियाणा। हरियाणा के पूर्व सीएम भूपिंदर सिंह हुड्डा के कहने पर कांग्रेस ने बीते दिनों प्रदेश का नया अध्यक्ष उदयभान को बनाया था। उदयभान को भूपिंदर सिंह हुड्डा के करीबी नेताओं में शुमार किया जाता है। उन्हें कुमारी शैलजा की जगह यह जिम्मा दिया गया, जिनसे हुड्डा की नहीं बनती थी। हरियाणा कांग्रेस में हुए इस बदलाव को हाईकमान और भूपिंदर सिंह हुड्डा के बीच सीजफायर के तौर पर देखा गया था।  इसकी वजह यह थी कि भूपिंदर सिंह हुड्डा भी जी-23 के उन नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने सोनिया गांधी को लेटर लिखकर पार्टी में बदलावों की मांग की थी। ऐसे में हुड्डा को हरियाणा कांग्रेस में अपरहैंड देने से उम्मीद की जा रही थी कि वह अपना बागी रुख छोड़ देंगे।

आनंद और चव्हाण संग फिर क्यों की आजाद से मुलाकात

इसके बाद भी ऐसा होता नहीं दिख रहा है। मंगलवार को उन्होंने पार्टी छोड़ने वाले नेता गुलाम नबी आजाद से मुलाकात की। इस दौरान आनंद शर्मा और महाराष्ट्र के पूर्व सीएम पृथ्वीराज चव्हाण भी मौजूद थे। गुलाम नबी आजाद के पार्टी छोड़ने के बाद भी उनसे मुलाकात ने हु़ड्डा के रवैये पर सवाल खड़े किए हैं। बागी समूह में उनकी लगातार मौजूदगी ने कांग्रेस आलाकमान की चिंताओं को बढ़ा दिया है। हुड्डा ने पिछले दिनों आजाद के एग्जिट पर भी कहा था कि पार्टी को उनसे बात करनी चाहिए थी, वरना ऐसा नहीं हो पाता। साफ है कि भूपिंदर सिंह हुड्डा अब भी बागी ग्रुप के करीब हैं और वह कांग्रेस की चिंताओं को आने वाले दिनों में बढ़ा सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो फिर कांग्रेस को पंजाब की तरह ही हरियाणा में भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।

कैसे हरियाणा में हो सकता है पंजाब जैसा हाल

कैप्टन अमरिंदर सिंह के कांग्रेस छोड़ने के बाद पार्टी पंजाब में घिर गई थी। नवजोत सिंह सिद्धू और चरणजीत सिंह चन्नी के बीच अदावत थी और पार्टी दोनों के टकराव से बिखरती चली गई, जिसकी शुरुआत कैप्टन अमरिंदर सिंह के एग्जिट से हुई थी। यदि भूपिंदर सिंह हुड्डा के साथ कांग्रेस की अनबन होती है तो पार्टी को 2024 के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मुश्किल उठानी होगी। इसकी वजह यह है कि भूपिंदर सिंह हुड्डा के अलावा कांग्रेस के पास हरियाणा में कोई बड़ा और जिताऊ चेहरा नहीं है। अशोक तंवर पार्टी से पहले ही अलग हो चुके हैं। इसके अलावा रणदीप सुरजेवाला का कोई जनाधार नहीं माना जाता। कुमारी शैलजा और किरण चौधरी जैसे नेता भी जमीनी नेता कभी नहीं रहे हैं।

भाजपा की ताकत पहले जैसी नहीं, फिर भी क्यों मुश्किल में कांग्रेस

ऐसे में जाट बिरादरी से आने वाले हुड्डा का कांग्रेस से अलगाव पार्टी के लिए बड़ी चिंता का सबब हो सकता है। एक तरफ हुड्डा की जगह पर कांग्रेस कोई वैकल्पिक नेतृत्व तैयार नहीं कर पाई है तो वहीं पूर्व सीएम बगावत की राह पर निकल पड़े हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस हरियाणा जैसे प्रदेश में भी कमजोर हो सकती है। हरियाणा में बीते दो टर्म से भाजपा का शासन है और पिछली बार वह अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाई थी। इसके चलते उसने जजपा से गठबंधन किया था। साफ है कि भाजपा की स्थिति 2014 जैसी नहीं है, लेकिन उसके बाद भी कांग्रेस अवसर को खोती दिख रही है।

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