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रामचरितमानस विवाद से आखिर किसे साध रहे अखिलेश यादव? दिलचस्प मोड़ ले रही यूपी की राजनीति

रामचरितमानस विवाद से आखिर किसे साध रहे अखिलेश यादव? दिलचस्प मोड़ ले रही यूपी की राजनीतिलखनऊ। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखित महाकाव्य रामचरितमानस को लेकर विवाद बिहार से शुरू हुआ था लेकिन अब इसके चलते उत्तर प्रदेश की राजनीति भी गरमाई हुई है। विवाद की शुरुआत बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर के एक बयान से हुई थी। वहीं यूपी में यह विवाद समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के एक बयान से उपजा। मौर्य ने तुलसीदास की रचनाओं के कुछ हिस्सों पर सवाल उठाए। इसको लेकर विवाद जारी है। जब विवाद हुआ को अखिलेश यादव अपने नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के समर्थन में आ गए। अखिलेश द्वारा मौर्य का समर्थन इस बात का संकेत देता है कि सपा नया राजनीतिक आधार तलाश रही है और वह आधार अति पिछड़ा वर्ग (MBC) हो सकता है।

सोमवार को, अखिलेश ने फिर से मौर्य का समर्थन किया।  श्रीरामचरितमानस पर टिप्पणी करके विवादों से घिरे अपने सहयोगी स्वामी प्रसाद मौर्य का बचाव करते हुए समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा है कि वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से विधानसभा सदन में इस महाकाव्य की एक चौपाई में इस्तेमाल किए गए ‘ताड़ना’ शब्द की व्याख्या पूछेंगे।

यादव ने रविवार रात यहां संवाददाताओं से बातचीत में कहा “हमारे मुख्यमंत्री एक संस्थान से निकले हैं और वह योगी हैं। मैं उनसे विधानसभा सदन में यह पूछूंगा कि श्रीरामचरितमानस में जिन पंक्तियों का जिक्र इस वक्त चल रहा है उनमें ताड़ना शब्द का इस्तेमाल किन लोगों के लिए किया गया है और वह किन पर लागू होती है।” स्वामी प्रसाद मौर्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के सवाल पर उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा “भाजपा किसी के भी खिलाफ मुकदमा दर्ज करा सकती है।”

रिपोर्टों की मानें तो खुद सपा नेताओं को भी यह उम्मीद नहीं थी कि अखिलेश यादव स्वामी मौर्य का समर्थन करेंगे। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि शनिवार को अखिलेश के साथ बैठक के बाद मौर्य का प्रमोशन हो जाएगा। सपा के कई उच्च जाति के नेताओं, जैसे ब्राह्मणों और ठाकुरों ने भी मौर्य की टिप्पणी पर नाखुशी जताई है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि वे उनके खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद करते हैं।

पिछले कुछ चुनावों के रुझानों को देखें तो साफ है कि भाजपा गैर-यादव ओबीसी को लुभाने में कामयाब रही। ऐसे में बसपा के खराब प्रदर्शन के चलते दलित वोट बैंक अलग-थलग महसूस कर रहा है। अब इन्हीं वोटों को हथियाने के लिए सपा को एक मौका दिख रहा है। सपा के पास अपने MY (मुस्लिम-यादव) वोट बैंक में एमबीसी को जोड़ने का एक अच्छा मौका मिल रहा है। रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास ब्राह्मण थे, इसलिए सपा का अभियान कलवार, भील, कोल, तेली और कुम्हार जैसी निचली जातियों से संबंधित रामचरितमानस की चौपाइयों के इर्द-गिर्द केंद्रित है।

2007 में, जब यूपी में बसपा की सरकार बनी को कहा गया कि मायावती अपने दलित वोट बैंक में आश्चर्यजनक रूप से ओबीसी और मुसलमानों को जोड़ने में कामयाब रहीं। वहीं, इसी तरह 2012 में सपा अपना जनाधार बढ़ाने और सत्ता में आने में सफल रही। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों के साथ-साथ 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की लगातार जीत ने यह साबित किया कि पार्टी ओबीसी और दलितों को अपने सवर्णों वोट बैंक से जोड़ने में कामयाब रही।

पूर्वी यूपी में एमबीसी के एक प्रमुख नेता ओम प्रकाश राजभर के साथ अपने गठबंधन से भाजपा को एक हद तक मदद मिली थी, जो 2017 में इसके साथ चुनाव लड़े थे। हालांकि, राजभर 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले सपा खेमे में चले गए थे, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि उनका झुकाव एक बार फिर से भाजपा की ओर है। वे मौर्य पर हमला करने में सबसे आगे रहे हैं।

मौर्य का खुला समर्थन कर सपा, सीधे तौर पर राजभर को भी चुनौती दे रही है। सपा एक ऐसे नेता के रूप में अपनी ताकत बढ़ा रही है जो राजभर को एक प्रमुख एमबीसी नेता के रूप में चुनौती दे सकते हैं, वो भी पूर्वी यूपी से। रामचरितमानस विवाद में अखिलेश के तेजी से पलटने से भाजपा बौखला गई है। यह सपा प्रमुख पर उसके हमलों से स्पष्ट है। इसने तुलसीदास के काम पर टिप्पणी को “हिंदू भावनाओं पर हमला” कहा और अखिलेश की तुलना महमूद गजनी और मुहम्मद गोरी से की। रामचरितमानस पर मौर्य की टिप्पणी को लेकर भाजपा कार्यकर्ताओं ने लखनऊ में मौर्य के खिलाफ दो प्राथमिकी दर्ज करायी हैं। इस मुद्दे पर स्वामी प्रसाद मौर्य और सपा पर हमला करने के लिए भाजपा ने अब अपने ओबीसी नेताओं केशव प्रसाद मौर्य (उपमुख्यमंत्री) और भूपेंद्र सिंह चौधरी (इसके राज्य प्रमुख) के आगे किया है।

क्या है विवाद? 

गौरतलब है कि स्वामी प्रसाद मौर्य ने इसी महीने 22 जनवरी को श्रीरामचरितमानस की एक चौपाई का जिक्र करते हुए कहा था कि उनमें पिछड़ों, दलितों और महिलाओं के बारे में आपत्तिजनक बातें लिखी हैं, जिससे करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचती है। लिहाजा इस पर पाबंदी लगा दी जानी चाहिए।

मौर्य की इस टिप्पणी को लेकर काफी विवाद उत्पन्न हो गया था। साधु-संतों तथा भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने उनकी कड़ी आलोचना की थी। उनके खिलाफ लखनऊ में मुकदमा भी दर्ज किया गया। उनके समर्थन में आए एक संगठन के कार्यकर्ताओं ने रविवार को श्रीरामचरितमानस के कथित आपत्तिजनक अंश की प्रतियां जलाई थीं। इस मामले में भी आज मुकदमा दर्ज हुआ है। उसमें स्वामी प्रसाद मौर्य को भी आरोपी बनाया गया है।

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