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केसी त्यागी की जगह धनंजय सिंह की ‘ताजपोशी’… नीतीश कुमार के इस फैसले के क्या हैं सियासी मायने?

केसी त्यागी, नीतीश कुमार, धनंजय सिंह नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू बिहार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश में भी चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान कर चुकी है. पार्टी ने सपा के साथ गठबंधन के भी संकेत दिए हैं. ऐसे में जेडीयू 2024 के चुनाव से पहले यूपी में अपने संगठन को नए तरीके से धार देने की कवायद कर रही है. जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उत्तर प्रदेश से आने वाले दिग्गज नेता केसी त्यागी की जगह बाहुबली नेता धनंजय सिंह को जगह दी गई है. धनंजय सिंह को राष्ट्रीय महासचिव बनाकर जेडीयू ने यूपी के पूर्वांचल को साधने के लिए बड़ा सियासी दांव चला है.

जेडीयू की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 22 नेताओं को महासचिव बनाया गया है, जिसमें पार्टी के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव रहे केसी त्यागी को जगह नहीं मिल सकी. उत्तर प्रदेश से आने वाले केसी त्यागी लंबे वक्त से नीतीश कुमार के साथ हैं और पार्टी संगठन में अलग पदों पर रह चुके हैं. त्यागी जेडीयू में शरद यादव से लेकर नीतीश कुमार, आरसीपी सिंह और ललन सिंह की टीम में महासचिव रहे हैं, लेकिन इस बार उनकी जगह पर जौनपुर से सांसद रहे बाहुबली नेता धनंजय सिंह को राष्ट्रीय महासचिव का जिम्मा सौंपा गया है.

केसी त्यागी पश्चिमी यूपी से आते हैं

केसी त्यागी पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आते हैं और उन्होंने चौधरी चरण सिंह के साथ राजनीतिक पारी शुरू करने के बाद जनता दल और फिर नीतीश कुमार के साथ जुड़ गए.  केसी त्यागी 1989 में  जनता दल के टिकट पर हापुड़-गाजियाबाद लोकसभा सीट से जीतकर सांसद चने गए. इसके बाद राज्यसभा में भी रहे. लंबे समय से जेडीयू के साथ हैं, लेकिन अब पांच दशक की राजनीतिक पारी खेलने के बाद ब्रेक लिया है. केसी त्यागी पश्चिमी यूपी के गाजियाबाद से आते हैं और त्यागी ब्राह्मण समाज से हैं. मौजूदा समय में त्यागी समुदाय बीजेपी का कोर वोटबैंक माने जाते हैं और पश्चिमी यूपी की चंद सीटों तक ही सीमित हैं.

पूर्वांचल से धनंजय सिंह आते हैं

वहीं, धनजंय सिंह को जेडीयू अब यूपी में आगे बढ़कर अपने सियासी आधार को मजबूत करने का दांव चला है. धनजंय सिंह पूर्वांचल के जौनपुर जिले से आते हैं, जहां से वह सांसद रह चुके हैं और कई बार विधायक भी चुने गए हैं. धनंजय ठाकुर जाति से आते हैं और जौनपुर में अपनी जाति के बीच उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है. इसी का नतीजा है कि धनजंय सिंह जिस मल्हनी सीट से चुनाव लड़ रहे थे, वहां पर 2022 के चुनाव में बीजेपी की जमानत जब्त हो गई थी. इस सीट से सपा जीतने में सफल रही थी, लेकिन धनंजय ने जेडीयू के टिकट पर लड़कर अपना दम दिखा दिया था. यूपी में जेडीयू इकलौती यही सीट थी, जिस पर अपनी जमानत बचाने में सफल रही थी.

पूर्वांचल पर जेडीयू का फोकस

उत्तर प्रदेश में जेडीयू को अपने राजनीतिक विस्तार की काफी संभावनाएं दिख रही हैं और सामाजिक समीकरण उसे अपने अनुकूल दिख रहा. बिहार से सटे यूपी के जिलों में कुर्मी समुदाय की बड़ी आबादी है. सूबे में कुर्मी समाज की आबादी यादवों के लगभग बराबर है. इसके अलावा अति पिछड़े समुदाय की भी अच्छी तादाद है. इसके चलते जेडीयू नीतीश को 2024 के चुनाव में उतारने की रणनीति पर काम कर रही. जौनपुर के पूर्व सांसद धनंजय सिंह को जेडीयू ने अपना राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है. इस तरह से जेडीयू ने पूर्वांचल के इलाके में अपनी सियासी जमीन मजबूत बनाने की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर चुकी है.

धनंजय के जरिए यूपी में एंट्री का प्लान
धनजंय सिंह के जरिए जेडीयू पूर्वांचल में ठाकुर और कुर्मी वोटों का समीकरण बनाने का दांव है. ललन सिंह ने जिस तरह से पिछले दिनों यूपी में सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं. ऐसे में अखिलेश यादव राजी हो जाते हैं तो जेडीयू यूपी में जौनपुर लोकसभा सीट पर दावेदारी कर सकती है. जौनपुर संसदीय सीट पर फिलहाल बसपा का कब्जा है और सपा को यह सीट जेडीयू को देने में भी किसी तरह की कोई अड़चन नहीं होगी.

धनंजय सिंह के चुनाव लड़ने पर बीजेपी के कोर वोटबैंक ठाकुर समुदाय में बड़ी सेंधमारी हो सकती है. इसके अलावा कुर्मी मतदाता भी अच्छी खासी संख्या में है, जिसे नीतीश कुमार का कोर वोटबैंक माना जाता है. इस तरह सपा के साथ गठबंधन होने पर जेडीयू जौनपुर सीट पर मुस्लिम, कुर्मी, ठाकुर और यादव वोटों का समीकरण बनाकर बीजेपी से मुकाबला करने का तानाबाना बुन रही है. नीतीश कुमार भी विपक्षी एकता की कवायद में जुटे है और यूपी में उन्होंने अखिलेश यादव को विपक्ष की अगुवाई करने का खुला ऑफर दे चुके हैं.

नीतीश कुमार कुर्मी समुदाय से आते हैं और कुर्मियों का सियासी आधार पूर्वांचल के इलाके में अच्छा खासा है. यूपी में कुर्मी समुदाय बीजेपी का कोर वोटबैंक है. ऐसे में सपा के साथ जेडीयू के गठबंधन करने पर कुर्मी समुदाय के मतदाता बीजेपी से छिटक सकता है. हालांकि, कुर्मी वोटों के लिए अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) के साथ गठबंधन कर रखा है. मिर्जापुर सीट से अनुप्रिया पटेल ही सांसद हैं. इसके अलावा बीजेपी कुर्मी समुदाय के नेताओं को यूपी में योगी कैबिनेट से लेकर केंद्र की मोदी सरकार तक में कैबिनेट मंत्री बना रखी है. बीजेपी कुर्मी वोटों को साधे रखने की अपनी ओर से पूरे कोशिश कर रखी है, लेकिन कुर्मी समुदाय का वोटिंग पैटर्न देखें तो वह किसी पार्टी से ज्यादा अपने समाज के नेताओं को खास तवज्जे देते हैं. 2022 के चुनाव में इस झलक दिख चुकी है.

यूपी में एक दर्जन से ज्यादा लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जिन पर कुर्मी समुदाय निर्णायक भूमिका निभाते हैं. यूपी में कुर्मी जाति की संत कबीर नगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थ नगर, बस्ती और बाराबंकी, कानपुर, अकबरपुर, एटा, बरेली और लखीमपुर जिलों में ज्यादा आबादी है. इन लोकसभा सीटों पर कुर्मी समुदाय या जीतने की स्थिति में है या फिर किसी को जिताने की स्थिति में. ऐसे में देखना है कि कुर्मी मतदाताओं की पहली पसंद कौन पार्टी बनती है?

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