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कांग्रेस को अहमियत दे रही या फंसा रही सपा?

17 सीटों पर मुश्किल है कांग्रेस के लिए सियासी खेल, समझिए पूरा गणित

कांग्रेस को अहमियत दे रही या फंसा रही सपा? 17 सीटों पर मुश्किल है सियासी खेल, समझिए पूरा गणितलोकसभा चुनाव 2024 में एनडीए गठबंधन से लोहा लेने के लिए विपक्षी पार्टियों ने इंडिया गुट तैयार किया है। इंडिया गुट के घटक दलों के बीच धीरे-धीरे सीटों का बंटवारा तय हो रहा है। इंडिया गुट की अहम पार्टियों में से एक समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस यूपी में एक साथ चुनाव लड़ने वाली हैं। इसके लिए दोनों पार्टियों के बीच सीट शेयरिंग को लेकर सहमति बन गई है। लोकसभा चुनाव 2024 के लिए सपा ने कांग्रेस को 17 सीटें ऑफर की हैं। यानी इन 17 सीटों पर कांग्रेस की सीधी लड़ाई एनडीए और बसपा से होगी। समाजवादी पार्टी के पीछे हट जाने की वजह से क्या इन सीटों पर फतह हासिल करना कांग्रेस के लिए आसान होगा? या अहमियत देने के नाम पर सपा कांग्रेस को फंसा रही है? आइए देखते हैं उन 17 सीटों पर विगत लोकसभा चुनावों में पार्टियों का प्रदर्शन।

17 सीटों पर सपा ने दिया कांग्रेस को लड़ने का न्योता

लोकसभा चुनाव 2024 के लिए सपा ने कांग्रेस को जिन 17 सीटों को ऑफर किया है उसमें रायबरेली, अमेठी, कानपुर नगर, फतेहपुर सीकरी, बांसगांव, सहारनपुर, प्रयागराज, महराजगंज, वाराणसी, अमरोहा, झांसी, बुलंदशहर, गाजियाबाद, मथुरा, सीतापुर, बाराबंकी, देवरिया सीट शामिल है। इन सीटों पर कांग्रेस के प्रदर्शन को देखा जाए तो विगत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस केवल रायबरेली की सीट बचाने में कामयाब रही है। वहीं चंद सीटों की बात करें तो कांग्रेस का वहां से लड़ना नाक की लड़ाई हो जाती है। वाराणसी और अमेठी से कांग्रेस का चुनाव लड़ना एनडीए के खिलाफ वर्चस्व की लड़ाई साबित होती नजर आ रही है क्योंकि वाराणसी से खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव में बतौर उम्मीदवार खड़े होते हैं। वहीं अमेठी की सीट अब तक राहुल गांधी के खाते में जाती थी। मगर बीते लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को हार मिली थी और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने यहां कब्जा जमाया था।

बात करें अन्य सीटों की तो बुलंदशहर बीजेपी का गढ़ माना जाता रहा है। यहां से 2009 के लोकसभा चुनाव में सपा ने जीत हासिल की थी। नहीं तो साल 1991 से यह सीट भाजपा के पास रही है। भाजपा के कद्दावर नेता कल्याण सिंह भी बुलंदशहर सीट से सांसद रहे हैं। उसी तरह गाजियाबाद सीट भी बीते तीन लोकसभा चुनाव से बीजेपी के खाते में जाती रही है। गाजियाबाद से 2009 में राजनाथ सिंह और 2014 से जनरल वीके सिंह जीतकर आ रहे हैं। मथुरा सीट पर बीते दो लोकसभा चुनाव में हेमा मालिनी 50 प्रतिशत से अधिक वोटों को हासिल कर जीत रही हैं।

बांसगांव में तीन बार और झांसी, सीतापुर, बाराबंकी, कानपुर नगर, फतेहपुर सीकरी, प्रयागराज, महाराजगंज और देवरिया जैसी सीटों पर बीते दो लोकसभा चुनाव में भाजपा चुनाव जीत रही है। वहीं अमरोहा और सहारनपुर में कांग्रेस का सीधा मुकाबला बसपा से माना जा रहा है, क्योंकि इन दोनों लोकसभा सीटों पर मायावती की पार्टी अपने सांसद लोकसभा भेज रही है।

इन सभी सीटों पर कांग्रेस की स्थिति तीसरे नंबर पर रही है। वहीं ज्यादातर सीटों पर सपा के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर हैं। ऐसे में इस बार का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए लिटमस टेस्ट साबित होगा क्योंकि इस बार के चुनाव में कांग्रेस के सामने एनडीए और बसपा के अलावा वैचारिक टकराव वाली पार्टी कोई बड़ी पार्टी या उम्मीदवार नहीं खड़ा होगा। जिन सीटों 17 सीटों को समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस को किया वहीं कांग्रेस के लिए लड़ाई काफी मुश्किल होने वाली है क्योंकि इन सीटों पर कई वीआईपी उम्मीदवार या तो मौजूदा लोकसभा में सांसद हैं या पहली पिछली लोकसभा चुनाव में अपनी-अपनी पार्टी का झंडा गाड़ चुके हैं। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि सीटों पर कांग्रेस कैसे चेहरों को उतारती है।

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