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आखिर लौहपुरुष इतने चुप-चुप क्यों हैं?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस लोकसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के टिकट कटने को लेकर भाजपा नेतृत्व पर निशाना साधा है. बुधवार को उन्होंने कहा कि यह देखना वास्तव में दुखद है कि पार्टी संस्थापकों से किस तरह का बर्ताव किया जा रहा है. ममता बनर्जी ने कहा, ‘मैंने आडवाणी जी से बात की. उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा. उन्होंने कहा कि उन्हें अच्छा लगा कि मैंने उन्हें फोन किया.’ तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ने कहा, ‘मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहती क्योंकि यह भाजपा का अंदरूनी मामला है.’

ज्यादा कुछ न कहने की बात करने के बावजूद ममता बनर्जी ने लालकृष्ण आडवाणी के टिकट कटने पर काफी कुछ कह दिया. लेकिन सवाल उठता है कि जिन आडवाणी का टिकट कटा है वे खुद इतने चुप क्यों हैं.

भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आज भी मार्गदर्शक मंडल से थोड़ा असहज और डरा सहमा सा है. दिल्ली के पत्रकारों के बीच खबरें घूम रही है कि बहुत जल्द भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेता एक साथ आएंगे और मोदी सरकार के खिलाफ हल्ला बोलेंगे. बस इस गुट को लालकृष्ण आडवाणी का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन अभी तक नहीं मिल पाया है इसलिए ये बहुप्रतीक्षित प्रेस कांफ्रेंस टलती जा रही है.

सुनी-सुनाई है कि लालकृष्ण आडवाणी को मनाने के लिए नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत दोनों के स्तर पर ही जबरदस्त कोशिश हुई है. संघ से भाजपा में आए और संगठन की जिम्मेदारी उठाने वाले रामलाल पार्टी और आडवाणी के बीच सूत्र का काम कर रहे हैं. आडवाणी के एक साक्षात्कार के लिए प्रिंट से लेकर वेबसाइट और टीवी पत्रकारों की पचास से ज्यादा गुजारिशें उनके सचिव दीपक चोपड़ा के पास पहुंच चुकी हैं. लेकिन फिलहाल आडवाणी कुछ बोलना ही नहीं चाहते इसलिए आडवाणी के सबसे विश्वस्त दीपक चोपड़ा पत्रकारों को कोई इंटरव्यू मिलने की उम्मीद छोड़ देने की बात कहते हैं.

बरसों से भाजपा की खबर रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि लालकृष्ण आडवाणी से जब उनकी मुलाकात हुई तो आडवाणी ने बड़े दार्शनिक अंदाज़ में कहा कि उम्र के इस पड़ाव में वे अपनी पार्टी के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे. जब कुछ पत्रकारों ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बारे में कुछ कहने के लिए कहा तो आडवाणी ने शाह का नाम तक नहीं लिया. लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रति उनका स्नेह अब भी उतना कम नहीं हुआ है जितनी कयासबाजी मीडिया में चल रही है.

सूत्रों के मुताबिक आडवाणी की यह बात सुनकर ऐसे बहुत लोग चौंक गए जो यह मान बैठे थे कि आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बीच कटुता बहुत बढ़ गई है. आडवाणी के बहुत करीबी एक नेता बताते हैं कि लौहपुरुष अब सियासत से संन्यास लेने का मन बना चुके हैं और उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करने का फैसला किया है, इसलिए उन्होंने अपने परिवार के किसी भी सदस्य को टिकट देने की जिद या पैरवी पार्टी से नहीं की. यह जरूर है कि पार्टी चाहती थी कि आडवाणी अपनी तरफ से एक बयान जारी कर दें कि वे लोकसभा चुनाव नहीं लड़ना चाहते, लेकिन ऐसा हो ना सका.

ऐसा क्यों नहीं हुआ, इसके पीछे भी लालकृष्ण आडवाणी का अपना तर्क है. भाजपा के अंदर की खबर देने वाले एक नेता की बातों पर यकीन करें तो आडवाणी इस उम्र में भी व्यक्ति से ऊपर पार्टी को मानते हैं इसलिए उन्होंने साफ कहा कि ये परंपरा अच्छी नहीं कि पहले व्यक्ति किसी सीट से दावा छोड़े और फिर पार्टी वह सीट बदले. ऐसे में तो हर सिटिंग सांसद का टिकट काटने से पहले उससे बयान दिलवाना जरूर हो जाएगा. इसलिए उन्होंने पार्टी के मध्यस्थ रामलाल से कहा कि पार्टी की चुनाव समिति टिकट बंटवारे पर फैसला करती आई है, और वही इस बार भी फैसला करे, भले ही वह टिकट आडवाणी का हो या फिर मुरली मनोहर जोशी का.

लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी बात रामलाल को बता दी, लेकिन मुरली मनोहर जोशी बहुत नाराज़ हैं. रामलाल और जोशी के बीच हुई बातचीत का ब्योरा देते हुए एक सूत्र ने कहा कि जोशी कुछ अप्रत्याशित कर सकते हैं. इसलिए जब टिकट कटने की खबर आई तो जोशी ने कानपुर से लेकर दिल्ली और नागपुर तक अपनी बात सीधे पहुंचाई. आडवाणी की तुलना में अपनी कम उम्र और बेहतर सेहत का हवाला दिया. इससे जब बात नहीं बनी तो उन्होंने सीधा कहा कि कानपुर में उनके हजारों समर्थक हैं और अगर किसी गैर ब्राह्मण को टिकट दिया गया तो वह चुनाव हार जाएगा.

लेकिन मुरली मनोहर जोशी का गुस्सा अब भी शांत नहीं हुआ है. पहले से ही बागी यशवंत सिन्हा अब भाजपा के पुराने बुजुर्ग नेताओं से संपर्क में हैं. खबरे हैं कि मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, बीसी खंडूरी, भगत सिंह कोशियारी, कलराज मिश्र से संपर्क किया गया है. इसमें से कुछ नेता बगावत के मूड में हैं और कुछ लोकसभा चुनाव के नतीजे तक इंतजार करना चाहते हैं. उधर, नागपुर की राय यह है कि भाजपा में सक्रिय राजनीति करने की एक उम्र सीमा तय कर दी गई है और यह सीमा 75 साल की है. इसके बाद के बुजुर्ग नेताओं को संघ संन्यास लेने के लिए कहेगा और अगर वे आगे भी महत्वाकांक्षा रखते होंगे तो उनकी जगह राजभवन में होगी.

इसलिए जिन बुजुर्ग नेताओं को अभी विश्राम करने के लिए कहा गया है वे 23 मई तक आराम करेंगे और अगर पार्टी हार गई तो मुखबिर होकर बागी बन जाएंगे. नरेंद्र मोदी चुनाव जीत गए तो पहले से तय फॉर्मूले के तहत बहुत सारे नेताओं को राज्यपाल बनाया जा सकता है. इनमें भी आडवाणी एक ऐसे नेता हैं जो राजभवन जैसे किसी एडजस्टमेंट के खिलाफ रहे हैं, इसलिए आडवाणी को इस श्रेणी से ऊपर ही रखा गया है. उधर, जोशी इतने नाराज़ हैं कि उनके सामने राजभवन की बात छेड़ी भी नहीं गई है.

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