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घोषणा पत्र के कारण कांग्रेस पर छाया पाबंदी का खतरा, कोर्ट ने मांगा जवाब

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में पार्टियों ने जमकर वादे करने शुरू कर दिए हैं। इसी क्रम में कांग्रेस पार्टी ने वादा किया है कि अगर वह सत्ता में आई तो देश के 25 फीसदी गरीब परिवारों को हर साल 72,000 रुपये दिए जाएंगे। इस वादे को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के खिलाफ मानते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कांग्रेस पार्टी को नोटिस जारी किया।

नोटिस जारी कर कोर्ट ने पूछा है कि इस तरह की घोषणा वोटरों को रिश्वत देने की कैटगरी में क्यों नहीं आती और क्यों न पार्टी के खिलाफ पाबंदी या दूसरी कोई कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग से भी जवाब मांगा है।

कांग्रेस पार्टी और चुनाव आयोग को जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का वक्त दिया गया है। कोर्ट ने माना है कि इस तरह की घोषणा रिश्वतखोरी व वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश है।

यह आदेश चीफ जस्टिस गोविन्द माथुर और एसएम शमशेरी की डिवीजन बेंच ने अधिवक्ता मोहित कुमार और अमित पाण्डेय की जनहित याचिका पर दिया है। याचियों का कहना है कि इस घोषणा को घोषणापत्र से हटाया जाए। साथ ही याचियों के 3 अप्रैल 2019 को चुनाव आयोग को भेजे गये प्रत्यावेदन को निर्णीत किया जाए।

याचिका में कहा, कांग्रेस ने चुनावी घोषणा पत्र में छह हजार रुपये प्रतिमाह के हिसाब से 72 हजार रुपये सालाना 25 फीसद गरीबों के खाते में भेजने का वादा किया है। यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है। याचिका में कांग्रेस पार्टी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।

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