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पुण्य तिथि विशेष- अगर अटल बिहारी वाजपेयी नहीं होते, तो इन मामलों में पीछे रह जाता भारत

पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की आज पहली पुण्यतिथि है, आज पीएम मोदी उनकी समाधि पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देंगे, वाजपेयी देश के उन प्रधानमंत्रियों में शामिल हैं, जिन्होने ना सिर्फ देश को प्रशासन और रक्षा के क्षेत्र में आगे बढाया, बल्कि ऑर्थिक विकास के स्तर पर भी दुनिया में पैर जमाने की कोशिश की, जब 2004 में अटल जी ने मनमोहन सिंह को सत्ता सौंपी, तो भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती की ओर दृढता से कदम बढा रही थी, ये वही दौर था, जब भारत की जीडीपी 8 फीसदी से ज्यादा थी, और महंगाई दर 4 फीसदी से भी कम, विदेशी मुद्रा भंडार भी तत्कालीन समय के अनुसार उच्चतम स्तर पर था। आइये वाजपेयी जी के बड़े कामों के बारे में आपको बताते हैं।

टेलीकॉम क्रांति
वाजपेयी सरकार की सबसे बड़ी क्रांति टेलीकॉम नीति मानी जाती है, सरकार ने तय लाइसेंस फीस के बजाय रेवेन्यू शेयरिंग की व्यस्था की, इसके अलावा सरकार ने अंतरराष्ट्रीय टेलीफोन में विदेश संचार निगम लिमिटेड के एकाधिकार को खत्म किया, प्राइवेट कंपनियों के प्रतिस्पर्धा की जगह बनाई, जिससे विदेश में कॉल करने के दामों में कमी आई। साथ ही सरकार ने टेलीकॉम में सुधारों के लिये कई कदम उठाये ।

स्वर्णिम चतुर्भुज और ग्राम सड़क योजना 
अटल जी की सरकार के सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक थी स्वर्णिम चतुर्भुज और ग्राम सड़क योजना, इसके अंतर्गत उन्होने चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली और मुंबई को हाइवे से कनेक्ट कर व्यापार और यातायात के क्षेत्र में अद्वितीय काम किया, वहीं ग्राम सड़क योजना के तहत गांवों को पक्की सड़कों के जरिये शहर से जोड़ा, जिससे देश के आर्थिक विकास का एक सफल मॉडल बना।

राजकोषीय घाटे में ऐतिहासिक कमी लाना
वाजपेयी सरकार ने राजकोषीय घाटे में कमी लाने के लिये राजकोषीय जवाबदेही एक्ट बनाया, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र बचत में मजबूती आई, ये फाइनेंशियल ईयर 2000 में जीडीपी के माइनस 0.8 फीसदी से बढकर 2003 में 2.3 फीसदी तक पहुंच गई, इसे अर्थव्यवस्था के लिये अच्छा माना गया।

सर्व शिक्षा अभियान 
इस योजना को साल 2001 में लांच किया गया था, इसके तहत 6 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दिये जाने का प्लान था, इस योजना के लागू होते ही प्राइमरी स्कूलों में बच्चों की संख्या में तेजी से बढोतरी हुई, एक अनुमान के मुताबिक इस योजना के लागू होने के सिर्फ 4 सालों में स्कूल ना जाने वाले बच्चों की संख्या में 60 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।

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