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सिर्फ चार महीने में ही हो गई ‘तीरथ कथा’ की इति श्री

देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में फिर नाटकीय मोड़ आ गया है. एक बार फिर पहाड़ी राज्य में इतिहास ने खुद को दोहराया है और एक मुख्यमंत्री अपने तय कार्यकाल से पहले ही विदाई ले लिया है. तीरथ सिंह रावत ने देर रात शुक्रवार को राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया. उनकी तरफ से संवैधानिक संकट का हवाला देते हुए ये इस्तीफा दिया गया. वे महज 115 दिनों के लिए राज्य के सीएम बन पाए. उनका सीएम सफर जरूर कुंभ मेले से पहले शुरू हुआ लेकिन चारधाम यात्रा से पहले समाप्त भी हो लिया. ऐसे में उत्तराखंड के लिए तीरथ कथा खत्म हो चुकी है और अब नए सीएम का स्वागत किया जाएगा.

तीरथ की सीएम यात्रा पर एक नजर

10 मार्च को बतौर मुख्यमंत्री शपथ लेने वाले तीरथ सिंह रावत का सियासत के उस मुकाम पर पहुंच जाना कई लोगों को हैरान कर गया था. वे RSS से अपनी राजनीति शुरू किए थे, फिर बतौर बीजेपी कार्यकर्ता भी लगातार काम करते रहे, उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी सौंपी गई और राज्य के पहले शिक्षा मंत्री भी बने थे. लेकिन सीएम की जिम्मेदारी संभालते ही उनके सामने चुनौतियों का नया पहाड़ खड़ा था. कोरोना की दूसरी लहर अपना रौद्र रूप दिखाने जा रही थी, राज्य में कुंभ की तैयारी जोरों पर चल रही थीं. ऐसे में तीरथ के सामने आस्था और सुरक्षा के बीच किसी एक को चुनना मुश्किल था. उन्होंने आस्था पर जोर दिया और शुरुआती समय में कुंभ को हरी झंडी दिखा दी.

नतीजा ये हुआ कि राज्य में कोरोना के मामले काफी तेजी से बढ़ें, स्वास्थ्य सेवाएं कम पड़ गईं और कई लोगों ने अपनी जान गंवाई. मुख्यमंत्री बनते ही तीरथ के लिए ये बड़ी मुसीबत बन गया था. उस सब के ऊपर उनकी तरफ से दिए गए विवादित बयानों ने भी राजनीति को गरमाए रखा. कुंभ को लेकर एक मीटिंग में पूर्व सीएम तीरथ कह गए थे कि मां गंगा की कृपा से कोरोना नहीं फैलने वाला है.

छोटे कार्यकाल में बड़े विवाद

उनके इस छोटे कार्यकाल के दौरान ही मनमुटाव की खबरें भी जोर पकड़ती दिखी थीं. कई मौकों पर कहा गया कि त्रिवेंद्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत के बीच सबकुछ ठीक नहीं है. ये अटकलों का दौर भी इसलिए शुरू हुआ क्योंकि कुंभ के दौरान कोरोना जांच में फर्जीवाड़े के आरोप लग गए थे. इस पर त्रिवेंद्र की तरफ से तमाम दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई थी. उन्होंने न्यायिक जांच की भी मांग उठा दी थी. अब इस बारे में जब तीरथ सिंह से सवाल किया गया था तब उन्होंने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया कि ये विवाद उनके कार्यकाल में आने से पहले का रहा और तब वे सीएम नहीं थे.

कुंभ-चार धाम यात्रा को लेकर हुआ काफी बवाल

अब कुंभ को लेकर विवाद ठंडा पड़ा तो चारधाम पर भी तीरथ सरकार की किरकिरी हुई. सरकार ने 25 जून को एक फैसले के जरिए उत्तराखंड में चार धाम यात्रा को हरी झंडी दिखा दी थी. कुछ शर्ते जरूर रखी गई थीं, कोरोना गाइडलाइनल्स का पालन हो, इस पर भी जोर था, लेकिन यात्रा को रोके जाने के पक्ष में नहीं थी तीरथ सरकार. लेकिन हाई कोर्ट ने सरकार को कई मौकों पर आगाह किया. कोरोना का खतरा भी समझाया और कुंभ के अनुभव को भी याद करवाया. लेकिन सरकार ने उन तमाम चेतावनियों को नजरअंदाज किया और चार धाम यात्रा को मंजूदी दे दी गई.  तीरथ सरकार का ये रवैया कोर्ट को भी नाराज कर गया और फिर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सरकार के उस फैसले को ही पलट दिया जिसके जरिए चार धाम यात्रा को हरी झंडी दिखाई गई थी. यात्रा पर 7 जुलाई तक रोक लगा दी गई और भक्तों के लिए लाइव स्ट्रीमिंग पर जोर दिया गया.

तीरथ सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन फैसला आ पता उससे पहले ही उनकी सीएम यात्रा पर ब्रेक लग गया. अब अगर चार धाम यात्रा पर सरकार के पक्ष में कोई फैसला आता भी है तो उसका क्रेडिट तीरथ सिंह रावत को ना जाकर नए मुख्यमंत्री को जाएगा. ऐसा ही रहा है कि तीरथ सिंह रावत का 115 दिन वाला कार्यकाल जहां पर विवाद तो कई देखने को मिल गए हैं, कुछ बयानों पर बवाल भी हुआ, लेकिन उपलब्धियां सीमित रहीं और पहाड़ी राज्य को एक पर्यटन हब बनाने वाला उनका सपना भी अधूरा रह गया. इसी वजह से तीरथ सिंह रावत के लिए कहा जा रहा है- कुंभ से पहले शुरू-चारधाम से पहले खत्म.

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