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जानें कैसे होती है चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से कितना बदलेगा प्रोसेस?

नई दिल्ली। अब चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया बदल जाएगी. सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा प्रक्रिया को खारिज कर दिया है. अदालत ने कहा कि अब मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का भी वही तरीका होगा, जो सीबीआई चीफ की नियुक्ति का है.

जस्टिस केएम जोसेफ, जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार की बेंच ने ये फैसला सुनाया है. पांच जजों की बेंच ने उन याचिकाओं पर फैसला दिया है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसा सिस्टम बनाने की मांग की गई थी.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने ये भी साफ किया कि मौजूदा व्यवस्था तब तक जारी रहेगी, जब तक संसद इस पर कानून न बना दे.

ऐसे में जानना जरूरी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अब तक कैसे होती थी और अब कैसे होगी? चुनाव आयोग में राजनीतिक दखलंदाजी के आरोप कब-कब लगे?

कैसे नियुक्त होते हैं चुनाव आयुक्त?

राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं. इनका कार्यकाल 6 साल या फिर 65 साल की उम्र तक होता है.

मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर ही सैलरी मिलती है. मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद में महाभियोग के जरिए ही पद से हटाया जा सकता है.

क्या है चुनाव आयोग का ढांचा?

– चुनाव आयोग हमेशा से मल्टी-मेंबर बॉडी नहीं रही है. 1950 में जब चुनाव आयोग का गठन किया गया था, तब से 15 अक्टूबर 1989 तक इसमें सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त ही हुआ करते थे.

– 16 अक्टूबर 1989 से 1 जनवरी 1990 तक इसमें दो चुनाव आयुक्त के पद भी रहे. इस तरह इसमें तीन सदस्य हो गए.

– 2 जनवरी 1990 से 30 सितंबर 1993 तक फिर इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त का ही पद रहा. 1 अक्टूबर 1993 में कानून में फिर संशोधन किया गया और दो चुनाव आयुक्त के पद बनाए गए. तब से ही चुनाव आयोग में तीन सदस्य हैं.

चुनाव आयोग में नियुक्ति में राजनीतिक दखल

– 16 अक्टूबर 1989 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तब कानून में संशोधन किया गया और चुनाव आयुक्त के पद बनाए गए. ये सब आम चुनाव की घोषणा से कुछ समय ही हुआ. लिहाजा इसकी आलोचना हुई और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता से समझौता करने का आरोप लगा.

– 2 जनवरी 1990 को वीपी सिंह की सरकार ने नियमों में फिर बदलाव किया और चुनाव आयोग को एक सदस्यीय संस्था बना दिया.

– इसके बाद 1 अक्टूबर 1993 को पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने फिर नियम बदले और एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया.

– इसी तरह मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त (सेवा की शर्तें) कानून 1991 को अध्यादेश के जरिए संशोधित किया गया था. कानून का नाम भी बदल दिया गया था. इसके जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त को बराबरी का दर्जा दिया गया और रिटायरमेंट की उम्र 65 साल तय की गई.

– कांग्रेस सरकार के इस कदम को तब के मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने सुप्रीम कोर्ट में ये दलील देते हुए चुनौती दी कि ये चुनाव आयोग की शक्तियों को कम करने की कोशिश है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस अर्जी को खारिज कर दिया था.

चुनाव आयोग को लेकर विवाद

– 2021 में रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स और डेमोक्रेट्स ने राष्ट्रपति को एक पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने लिखा था कि कैसे एक संस्था आज विश्वनीयता के संकट से जूझ रही है.

– 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद चुनाव आयोग के कामकाज पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. कोरोना की दूसरी लहर के दौरान भी चुनाव आयोग पर सवाल उठे थे क्योंकि बगैर कोविड प्रोटोकॉल का पालन किए धड़ल्ले से चुनावी रैलियां हो रही थीं.

– अप्रैल 2021 में मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीब बनर्जी ने चुनाव आयोग पर सख्त टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था, कोरोना की दूसरी लहर के लिए एकमात्र जिम्मेदार चुनाव आयोग है. हाईकोर्ट ने ये भी कहा कि इसके लिए चुनाव आयोग पर मर्डर का केस चलाना चाहिए. मई 2019 में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मीटिंग में हिस्सा लेना भी बंद कर दिया था.

सुनवाई के दौरान क्या सवाल उठे?

– सुप्रीम कोर्ट में 2018 में याचिका दायर हुई थी, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसा सिस्टम बनाने की मांग की गई थी.

– अरुण गोयल केंद्र सरकार में सचिव थे और उन्हें वीआरएस देकर दो दिन के भीतर चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था.

– सुनवाई के दौरान जस्टिस केएम जोसेफ ने सवाल उठाया कि चार नामों को शॉर्टलिस्ट किया गया था, लेकिन सरकार ने उनका नाम चुना जो 6 साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले ही रिटायर हो जाएंगे. उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार को ऐसा नाम चुनना चाहिए जो कार्यकाल पूरा कर सके.

प्रक्रिया बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?

– सुनवाई के दौरान पांच जजों की बेंच ने नोट किया कि कोई भी राजनीतिक पार्टी सत्ता आ जाए, लेकिन चुनाव आयोग में नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर कानून नहीं बना सकी. सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मौजूदा कानून में ‘खामियां’ हैं.

– सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चयन प्रक्रिया में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को शामिल करना अहम साबित हो सकता है. पहले देखा गया है कि मौजूदा सिस्टम के तहत सत्ताधारी पार्टी ‘येस मैन’ को नियुक्त कर देती है. अगर चयन प्रक्रिया में चीफ जस्टिस को शामिल किया जाता है तो इसे ठीक किया जा सकता है.

– एक कमेटी बनेगी. इस कमेटी में प्रधानमंत्री होंगे. उनके अलावा लोकसभा में विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस होंगे.

– सुप्रीम कोर्ट ने आज फैसले में साफ किया है कि अगर लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष मौजूद नहीं हैं, तो सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को कमेटी में रखा जाएगा.

– ये कमेटी चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश करेगी. ये सिफारिश राष्ट्रपति के पास भेजी जाएगी और उनकी मंजूरी मिलने के बाद नियुक्ति की जाएगी.

– ये सीबीआई चीफ की नियुक्ति की तरह ही होगा. सीबीआई चीफ की नियुक्ति सिलेक्शन कमेटी की सिफारिश पर होती है. इस कमेटी में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और चीफ जस्टिस होते हैं.

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