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सच्ची श्रद्धांजलि दी है तो फिर करिये अटल बनने का प्रयास

राजेश श्रीवास्तव

बीते गुरुवार को जब भारत र‘ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निर्वाण हुआ तो पूरा देश स्तब्ध हो गया। सभी जगह से श्रद्धांजलि व शोक व्यक्त करने वालों का तांता लग गया। सभी ने अपने-अपने तरीके से दुख व्यक्त किया। यह स्वाभाविक भी था।

वह ऐसा कृतित्व ही था कि जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। चाहे पत्रकार के रूप में हो, कवि के रूप में हो, सांसद के रूप में हो, विदेश मंत्री के रूप में हो, प्रधानमंत्री के रूप में हो या फिर एक इंसान के रूप में। सभी किरदारों में अटल जी ने जो मानदंड बनाया, जो मूल्य स्थापित किये, जो आदर्शों की ऊंचाई तामीर की उस पर चल पाना आज के नेताओं के लिए बहुत मुश्किल ही कहा जा सकता है।

अटल जी के निधन के बाद जिस तरह से खासतौर पर नेताओं ने श्रद्धांजलि व्यक्त की उनसे सिर्फ यही कहना चाहता हूं कि अगर उन्होंने दिल से अटल जी को सच्ची श्रद्धांजलि व्यक्त की है तो अपने अंदर उनके कुछ गुणों को ही डालने का प्रयास करें।

यदि ऐसा संभव हो सका तो भारतीय राजनीति शायद एक आदर्श को हासिल कर सके। क्योंकि इन दिनों जिस तरह से राजनीति का स्तर गिर रहा है, मूल्यों का पतन हो रहा है। नेताओं के अंदर वादाखिलाफी घर कर गयी है। एक दृसरे को नीचा दिखाने, एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमले करने, एक-दृसरे के चरित्र को भी उछालने की जो राजनीति चल रही है।

उन नेताओं को अटल जी को श्रद्धांजलि व्यक्त करने का नैतिक अधिकार नहीं है। हम अगर किसी को नमन करते हैं तो कोशिश करनी चाहिए कि जिसको नमन कर रहे हंै उसकी बात मानें, उसके कहे पर अमल करें। राजनीति में नेताओं को सीखना चाहिए कि अटल जी ने किस तरह एक वोट गिरने पर सत्ता को हासिल करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।

उन्होंने कहा था कि मैं लोकापवाद से डरता हूं जो मुझ पर आरोप लगाए, मैं उस सत्ता को चिमटी से भी छूना पसंद नहीं करूंगा और तुरंत इस्तीफा देकर विपक्ष की राजनीति की। और आज की राजनीति को देखिये कि किस तरह दो-दो सीट हासिल करने के बावजूद सत्ता पर कब्जा हो जा रहा है। आज सत्ता पर काबिज होने वालों को सु्रपीम कोर्ट को दखल देना पड़ रहा है।

शपथ ग्रहण रोकने के लिए आधी-आधी रात कोर्ट को बैठना पड़ रहा है। अटल जी ने किस तरह विपक्षी नेताओं नेहरू, इंदिरा और राजीव को सम्मान दिया, यह भी अनुकरणीय है। उन्होंने अपने विरोधी नेताओं से मतभेद तो रखा लेकिन उनसे कभी मनभेद नहीं किया।

इसीलिए उनके निधन पर समूचा देश रो पड़ा था। हर दल के लोग उनके निधन पर मन से दुखी थ्ो। नेताओं को यह भी सोचना होगा कि क्या उनके पीछे भी ऐसी परिस्थितियां बनती दिख रही हैं और अगर नहीं तो कमी कहां हैं ? अटल बनना आसान नहीं है।

क्योंकि विचार तो इस बात का करना है कि राजनीति करनी है या सियासत। जनसेवा करनी है या सत्ता हासिल करनी है। हृदय पर राज करना है या कुर्सी पर। सबके हृदय पर अटल छवि बनानी है या फिर मंत्री पद हासिल करना ही मकसद है। तय आपको करना है आप जो तय करेंगे वह आपको हासिल हो जायेगा, अब देखना यह है कि आप चाहते क्या हैं।

राजनीति के जो ऊंचे आयाम अटल जी ने स्थापित किये उस पर पैदल चल कर श्रद्धांजलि तो व्यक्त की जा सकती है लेकिन उन पर अमल करके अटल बनने की राह पर आगे भी बढ़ा जा सकता है। आज भारतीय जनता पार्टी हो या फिर कांग्रेस या फिर समाजवादी पार्टी या फिर बहुजन समाज पार्टी या यूं कहें कि कांग्रेस।

सूबाई नेतृत्व को छोड़ दें तो अटल जैसी ऊंचाई किसी राजनेता को हासिल नहीं हुई। इंदिरा जी और राजीव गांधी के अंतिम दर्शन को पूरा भारत उमड़ पड़ा था लेकिन उनकी परिस्थितियां दूसरी थीं। अटल जी तो पिछले एक दशक से सार्वजनिक जीवन में थे ही नहीं, बीते पांच सालों में तो किसी ने उनकी एक तस्वीर भी नहीं देखी थी, उस अटल के लिए जिस तरह जनमानस उमड़ा, वह एक नजीर भर है कि आप उस रास्ते पर अमल करिये, अटल बनना कठिन है पर असंभव नहीं, प्रयास तो करिये।

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