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जो मजबूत और समृद्ध उन्हें SC/ST आरक्षण से क्यों नहीं किया जा रहा बाहरः सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सवाल, कहा- जिन्हें जरूरत, उन्हें मिले लाभ

सुप्रीम कोर्टराज्य सरकारें क्या एससी/एसटी आरक्षण में शामिल जातियों का उप-वर्गीकरण कर सकती कर सकती है या नहीं, इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट की 7 सदस्यीय संवैधानिक बेंच मंगलवार (06 फरवरी 2024) से कर रही है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एससी-एसटी आरक्षण का लाभ लेने वाले मजबूत जातियों को उप-समूह के तौर पर चिन्हित करके बाहर निकाला जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की 7 सदस्यीय संवैधानिक पीठ की अगुवाई CJI डीवाई चंद्रचूड़ कर रहे हैं। इस पीठ में जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मिथल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीशचंद्र शर्मा शामिल हैं। यह पीठ एससी-एसटी आरक्षण के भीतर वर्गीकरण की अनुमति के संदर्भ में सुनवाई कर रही है।

साल 2020 में पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह मामले में 5 सदस्यीय पीठ ने फैसला दिया था। अब उसे 7 सदस्यीय संवैधानिक पीठ के पास भेजा गया है। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साल 2005 के ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2005) 1 एससीसी 394 के फैसले पर पुनर्विचार करने की जरूरत बताई थी। उस दौरान कहा गया था कि एससी-एसटी वर्ग में वर्गीकरण की जरूरत नहीं है।

सुनवाई दे दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 6 फरवरी को कहा कि जो जाति समृद्ध हैं, उन्हें सामान्य वर्ग के साथ प्रतिस्पर्धा क्यों नहीं करना चाहिए? जस्टिस नाथ ने कहा, “कुछ उपजातियों ने अच्छा किया है और वो आगे बढ़ी हैं। ऐसे में उन्हें क्यों नहीं बाहर (रिजर्वेशन लिस्ट से) किया जाए? वो जातियाँ आरक्षण से बाहर आएँ और सामान्य वर्ग के साथ प्रतिस्पर्ध करें। अब वो वहाँ क्या कर रही हैं?”

जस्टिस बीआर गवई ने आगे कहा कि मजबूत हो चुकीं उप-जातियों को रिजर्वेशन से बाहर आना चाहिए, ताकि अन्य पिछली उपजातियों या सर्वाधिक पिछड़ी जातियों को भी आरक्षण का मौका मिल सके। उन्होंने कहा, “जिन पिछड़ी उप-जातियों को मौका नहीं मिला है, चलिए उन्हें मौका देते हैं।”

जस्टिस गवई ने आगे कहा, “गाँव में रहने वाला कोई व्यक्ति अगर आईएएस-आईपीएस बन जाता है तो उसके बच्चों को गाँव में रहने वाले अन्य बच्चों की तरह की कठिनाइयाँ नहीं झेलनी पड़ती। इसके बावजूद वो परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ पाता रहता है।” उन्होंने यह भी कहा कि ये संसद को तय करने दें कि ‘मजबूत और प्रभावी’ समूहों को आरक्षण की सीमा से बाहर निकालना है या नहीं।

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली सात सदस्यीय संविधान पीठ पंजाब अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग (सेवाओं में आरक्षण) अधिनियम 2006 की वैधता का भी अध्ययन कर रही है। यह अधिनियम अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए तय आरक्षण के तहत सरकारी नौकरियों में ‘मजहबी सिख’ और ‘वाल्मीकि’ समुदायों को 50 प्रतिशत आरक्षण और प्रथम वरीयता देती है।

दरअसल, CJI चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली यह पीठ इससे संबंधित 23 याचिकाओं को एक साथ करके इस पर सुनवाई कर रही है। इसमें सुप्रीम कोर्ट द्वारा साल 2004 में दिए गए फैसले की समीक्षा भी है। इसके अलावा, पंजाब सरकार द्वारा जारी एक प्रमुख याचिका भी शामिल है। उस याचिका में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के साल 2010 के फैसले को चुनौती दी गई है।

हाई कोर्ट ने वाल्मीकि और मजहबी सिखों को एससी वर्ग का 50 प्रतिशत आरक्षण देने के प्रावधान को गलत बताया था। हाई कोर्ट ने ईवी निन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के साल 2004 के फैसले को आधार बनाकर यह फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2004 में अपने फैसले में एससी-एसटी के भीतर उप-जाति विभाजन को गलत बताया था।

इस मामले को पंजाब सरकार ने साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और कहा था कि आंध्र प्रदेश का मामला उस पर लागू नहीं होता। चूँकि हरियाणा और पंजाब में अनुसूचित जनजाति की आबादी नहीं है, इसलिए उनके हिस्से का आरक्षण मजहबी सिखों और वाल्मीकि समुदाय को दी गई थी।

Exclude the strong sub-castes taking advantage of SC-ST reservation says Supreme Court

 

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