राफेल को लेकर राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के विलाप के पीछे की असली वजह क्या है? जरुर पढ़े

राहुल गांधी के रैफल विलाप को देखने और समझने के कई कोण है। एक जो सीधा सा दिखता व समझ मे आता है, वह यह है कि इन बीते 4 वर्षो में नरेंद्र मोदी जी की सरकार पर किसी तरह के भृष्टाचार का आरोप न लग पाना और किसी तरह के घोटाले में संलिप्तता में न पाया जाना है और उससे राहुल गांधी और उसकी कांग्रेस बुरी तरह हताश है।

दूसरा, राहुल और कांग्रेस को रक्षा के सौदों में करोड़ो अरबों की रिश्वत लेने का बड़ा पुराना अनुभव है और अब यह इनके विश्वास से परे है की इस रैफल लड़ाकू हवाई जहाज में मोदी सरकार ने कोई रिश्वत नही ली है। वह आज अपने रक्षा सौदों के रिश्वती इतिहास की हीनता से दबे हुये इस लिये विलाप कर रहे है।

तीसरा, रैफल को लेकर राहुल गांधी और उसकी कांग्रेस इस बात से भी आहत है कि उनके पास कई वर्षों से रैफल हवाई जहाज खरीदने का मामला था लेकिन वे नेगोशिएट नही कर पाये। पहले यह मामला इस बात को लेकर फंसा, क्योंकि जो रकम सोनिया गांधी सहायतार्थ कोष में जाना था, उस को लेकर परस्पर सहमति नही बन पा रही थी और बाद में नये बने रक्षा मंत्री एंटोनी को जब पता चला की इस सौदे में इतनी भारी भरकम रकम बीच से निकलनी है तो उन्होंने इस डील को डिले कर दिया। असल मे एंटोनी को इस मामले में अपने हाथ मे कालिख लगने का पूरा भरोसा था इसलिए उन्होंने अपनी ईमानदार छवि पर दाग लगने से सशंकित होकर रैफल के साथ साथ अन्य रक्षा सौदों को या तो ठंडे बस्ते में डाल दिया या उन पर हो रही कार्यवाही को ही धीमा कर दिया। कांग्रेस में एंटोनी ही एक मात्र ऐसा नेता रहे है जिनपर हमेशा से ईमानदारी का ठप्पा लगा रहा है और विपक्ष भी उन पर भृष्टाचार को लेकर कोई आरोप नही लगाता है।

रैफल को लेकर राहुल गांधी की छटपटाहट के पीछे ऊपर के तीनों कारण बड़े मामूली है क्योंकि यह कांग्रेस के राजनैतिक चरित्र व उनके अध्यक्ष के गांधी परिवार के दलाली खाने के इतिहास के साथ पूरी तरह से मेल खाते है। मेरी दृष्टि में राहुल गांधी के इस विलाप के पीछे जो सबसे महत्वपूर्ण कारण है वह उनके द्वारा लगाय गये आरोप और उसके साथ पूछे गये प्रश्न में निहित है।

राहुल गांधी को कीमत से मतलब नही है उसको इससे मतलब है की भारत सरकार और रैफल के बीच जो एग्रीमेंट हुआ है, उसके जो तकनीकी व आर्थिक सेग्मेंट्स है उनको सर्वजिनिक कराना है। राहुल गांधी को अच्छी तरह मालूम है की उनकी ही सरकार ने शुरू में ही अनुबंध में ‘नॉन डिस्क्लोजर’ की शर्त डाली हुई है। उनको यह भी मालूम है कोई भी सरकार आर्थिक पहलू से ऊपर जाकर एग्रीमेंट के डिटेल्स कभी भी सर्वजिनिक नही करेंगी। फिर जब यह सब मालूम है तो राहुल गांधी और उनके सहयोगी किस बात पर विलाप व आरोप लगा रहे है?

दरअसल यह राहुल गांधी की मजबूरी है। राहुल गांधी चीन का खाये हुये नमक का हक अता कर रहे है। भारत मे रैफल हवाई जहाजों के जो स्क्वार्डन बना रहा है उसका लक्ष्य पाकिस्तान नही है बल्कि वह चीन को लेकर उसकी रक्षा नीति का केंद्र बिंदु होने जारहा है। इस लड़ाकू हवाई जहाज की रेंज 1800 किमी तक की और वह आदेश मिलने के 3 मिनिट के अंदर निश्चित किये गए टारगेट के लिये उड़ान भरने की क्षमता रखता है।

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इसका एक स्क्वार्डन पश्चिम बंगाल में चीन की सीमा से 100 किमी की दूरी पर तैनात होगा। यह 2 इंजिन वाला मल्टी रोल वाला फाइटर प्लेन न्यूक्लियर मिसाइल छोड़ने में सक्षम है जिससे भारत की न्यूक्लियर डेटेरेंट क्षमता बहुत बढ़ जायेगी जो निश्चित रूप से पाकिस्तान के साथ चीन के लिये चिंता का विषय है। यही नही रैफेल ने भारत की मांग पर इसको बियॉन्ड विसुअल रेंज मेंटोर मिसाइल से भी सज्जित किया है जिससे शत्रु के राडार द्वारा मिसाइल को देख पाना संभव नही होगा और यह चीन के लिये बहुत बड़ी चिंता है। इसी के साथ इसमे यह भी क्षमता है कि लक्ष्य पर छोड़ी गई मिसाइल को बीच मे ही उसके लक्ष्य को परिवर्तित किया जा सकता है जिससे भारत को रण तकनीकी में चीन से बढ़त मिलेगी।

2019 में बनने वाले रैफल हवाई जहाज के यह दो स्क्वार्डन सिर्फ भारत की युद्ध मे आकाशीय क्षमता को नही बढायेंगे बल्कि भारत की सामरिक शक्ति को चीन पाकिस्तान से लेकर दक्षिणपूर्व एशिया व हिन्द महासागर तक एक अलग पहचान देंगे। सीमा पर भारत की रक्षा व सुरक्षा तन्त्र की सुदृढ़ता चीन की बहुत बड़ी चिंता है क्योंकि यह चीन की वैश्विक प्रभुत्व बनाने की उसकी महत्तवकांक्षा और उसकी विस्तारवादी नीति के फलीभूत होने में एक बड़ा रोड़ा है।

चीन की यही चिंता राहुल गांधी की चिंता बन गयी है। यह तो पूरे भारत ने देखा है कि गत वर्ष भूटान की सीमा पर चीन से हुये विवाद के बीच , चीनी दूतावास जाकर राहुल गांधी चीन को नैतिक समर्थन दे आये थे, यह विलाप भी इसी क्रम की अगली कड़ी है। मैंने रैफल लड़ाकू हवाई जहाज की जो यह सब तकनीकी बाते लिखी है यह सब पहले से ही सार्वजनिक है लेकिन इसके आर्थिक सेगमेंट और उसके साथ भारत को मिलने वाली अन्य सामरिक महत्व की तकनीकी और अन्य लाभों के बारे में सब बातें सर्वजिनिक नही है। चीन खुद विश्व बाजार में अपने J 31 , J 20 लड़ाकू हवाई जहाज बेचने में लगा है लेकिन अभी भी उसके द्वारा दिये जा रहे लड़ाकू विमानों को खास सफलता नही मिली है क्योंकि प्रतिस्पर्था में उनके मूल्य उनमे उपयुक्त तकनीकी के अनुकूल नही है।

चीन को इस पूरी डील के आर्थिक पहलुओं का जानना उसकी जहां व्यपारिक आवश्यकता है वही भारत को मिल रही आकाशीय युद्ध तकनीकियों को जानना उसके लिये भारत को प्रत्युत्तर देने के लिये आवश्यक है। अब क्योंकि गांधी परिवार दिल्ली की सत्ता में नही है इसलिये वह राहुल गांधी के विलाप और विरोध पर आशा लगाय है। हालांकि राहुल गांधी को मालूम है की भारत की सरकार उसकी कोई बकवास नही मानेंगी लेकिन उसको यह उम्मीद है कि इस बढ़ चढ़ कर किये गये विलाप से, सामरिक गुप्तता के दृष्टिगत मौन सरकार पर भृष्टाचार का आरोप लगाने में आंशिक रूप से सफल हो सकते है।

उसके साथ राहुल गांधी को अपने चीनी आकाओं को भी यह विश्वस्त करना है कि वह चीनी हितों के लिये किसी हद तक जा सकते है और इसके बदले उन्हें 2019 के चुनाव में चीन और उसके गुर्गों द्वारा पूरे तन, मन और धन से सहयोग मिलने का पूरा विश्वास है। राहुल गांधी सिर्फ कांग्रेस का ही अध्यक्ष नही है बल्कि चीन का भारत में महत्वपूर्ण एजेंट है।

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