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किसानों में आक्रोश को लेकर गांधी ने जो चेतावनी दी थी क्या आज हम उसी का सामना कर रहे हैं?

आधुनिक भारत में संगठित किसान आंदोलन के जनकों में से एक प्रोफेसर एनजी रंगा स्वयं एक किसान के बेटे थे. उन्होंने गुंटूर के ग्रामीण विद्यालय से लेकर ऑक्सफर्ड तक में अर्थशास्त्र की पढ़ाई की थी और वे गांधी से बेहद प्रभावित थे. गांधी से मिलते तो सवालों की झड़ी लगा देते थे और कई बार लंबी-लंबी प्रश्नावली पहले से लिखकर उन्हें सौंप देते थे. 1944 में जब गांधी जेल से रिहा हुए तो प्रोफेसर रंगा किसानी पर अपने सवालों की लंबी फेहरिस्त के साथ गांधी से मिलने जा पहुंचे. 29 अक्तूबर, 1944 को हुई इस मुलाक़ात में रंगा का पहला ही सवाल बहुत पैना था-

‘आप कहते हैं कि न्याय की दृष्टि से धरती किसानों की है या होनी चाहिए. लेकिन इसका अर्थ केवल अपनी जोत की ज़मीन पर नियंत्रण होना है या जिस राज्य में वह रहता है उस पर उसे राजनीतिक सत्ता प्राप्त होना भी है? क्योंकि यदि किसानों के पास केवल ज़मीन होगी और राजनीतिक सत्ता नहीं होगी, तो उनकी स्थिति उतनी ही खराब होगी जितनी सोवियत रूस में है. वहां राजनीतिक सत्ता पर तो सर्वहारा की तानाशाही ने अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया, लेकिन भूमि के सामूहिकीकरण के नाम पर किसान ज़मीन पर अपने अधिकार से हाथ धो बैठे?’

गांधीजी ने जवाब दिया – ‘मुझे पता नहीं कि सोवियत रूस में क्या हुआ है. लेकिन मुझे इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि यदि हमारे यहां लोकतांत्रिक स्वराज्य हुआ; और अहिंसक तरीकों से आज़ादी हासिल करने पर ऐसा होगा ही, तो उसमें किसानों के पास राजनीतिक सत्ता के साथ ही हर किस्म की सत्ता होनी ही चाहिए.’

नवंबर, 1947 में किसी ने गांधीजी को चिट्ठी लिखकर कहा कि भारत के तत्कालीन मंत्रिमंडल में कम से कम एक किसान तो होना ही चाहिए. इसके जवाब में 26 नवंबर, 1947 की प्रार्थना-सभा में महात्मा गांधी का कहना था – ‘हमारे दुर्भाग्य से हमारा एक भी मंत्री किसान नहीं है. सरदार (पटेल) जन्म से तो किसान हैं, खेती के बारे में समझ रखते हैं, मगर उनका पेशा बैरिस्टरी का था. जवाहरलालजी विद्वान हैं, बड़े लेखक हैं, मगर वे खेती के बारे में क्या समझें! हमारे देश में 80 फीसदी से ज्यादा जनता किसान है. सच्चे प्रजातंत्र में हमारे यहां राज किसानों का होना चाहिए. उन्हें बैरिस्टर बनने की जरूरत नहीं. अच्छे किसान बनना, उपज बढ़ाना, ज़मीन को कैसे ताज़ी रखना, यह सब जानना उनका काम है. ऐसे योग्य किसान होंगे तो मैं जवाहरलालजी ने कहूंगा कि आप उनके सेक्रेटरी बन जाइये. हमारा किसान-मंत्री महलों में नहीं रहेगा. वह तो मिट्टी के घर में रहेगा, दिनभर खेतों में काम करेगा, तभी योग्य किसानों का राज हो सकता है.’

अपनी मृत्यु से ठीक एक दिन पहले यानी 29 जनवरी, 1948 की प्रार्थना सभा में गांधी का कहना था – ‘मेरी चले तो हमारा गवर्नर-जनरल किसान होगा, हमारा बड़ा वजीर किसान होगा, सब कुछ किसान होगा, क्योंकि यहां का राजा किसान है. मुझे बचपन से एक कविता सिखाई गई – “हे किसान, तू बादशाह है.” किसान ज़मीन से पैदा न करे तो हम क्या खाएंगे? हिंदुस्तान का सचमुच राजा तो वही है. लेकिन आज हम उसे ग़ुलाम बनाकर बैठे हैं. आज किसान क्या करे? एमए बने? बीए बने? ऐसा किया तो किसान मिट जाएगा. पीछे वह कुदाली नहीं चलाएगा. किसान प्रधान (प्रधानमंत्री) बने, तो हिंदुस्तान की शक्ल बदल जाएगी. आज जो सड़ा पड़ा है, वह नहीं रहेगा.’

ऐसा नहीं है कि अपने जीवन के अंतिम वर्षों में ही गांधी किसानों के बारे में ऐसा विचार रखने लगे थे. बल्कि आज किसानों में जितना असंतोष है उसकी परिणति क्या हो सकती है, इसकी चेतावनी बहुत पहले गांधी ने दे दी थी. हालांकि यह बात उन्होंने जमींदारी के दौर में लिखी थी, लेकिन किसानों की स्थिति आज भी उससे बहुत अलग नहीं है. पांच दिसंबर, 1929 को ‘यंग इंडिया’ में वे लिखते हैं –

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‘…असल बात यह है कि (किसानों के लिए) कितना भी किया जाए, वह किसानों को उनका वाजिब हक देर से देने के सिवाय और कुछ नहीं है. यह वर्णाश्रम-धर्म की भयंकर विकृति का परिणाम है कि तथाकथित क्षत्रिय अपने को श्रेष्ठ मानता है और गरीब किसान परंपरागत निकृष्टता का दर्जा चुपचाप यह मानकर स्वीकार कर लेता है कि उसके भाग्य में यही लिखा है. यदि भारतीय समाज को शांतिपूर्ण तरीके से प्रगति करनी है, तो धनिक वर्ग को निश्चित रूप से यह स्वीकार कर लेना होगा कि किसान की भी वैसी ही आत्मा है जैसी उनकी है और अपनी दौलत के कारण वे किसानों से श्रेष्ठ नहीं हैं. जैसा जापान के उमरावों ने किया है, उसी तरह यहां के धनिकवर्ग को भी अपने आप को किसानों का संरक्षक मानना चाहिए और उनके पास जो धन है उसे यह समझकर रखना चाहिए कि उसका उपयोग उन्हें संरक्षित किसानों की भलाई के लिए करना है. उस हालत में वे अपने परिश्रम के शुल्क के रूप में वाजिब से ज्यादा नहीं लेंगे.’

महात्मा गांधी ने आगे लिखा था – ‘इस समय धनिकवर्ग के सर्वथा अनावश्यक दिखावे और फिजूलखर्ची तथा जिन किसानों के बीच वे रहते हैं उनके गंदगी से भरे वातावरण और पीस डालने वाले दारिद्र्य के बीच कोई अनुपात नहीं है. …इसलिए (धनिकवर्ग को चाहिए कि वह) किसानों के जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्वयं अपने को दरिद्र बना ले. वह अपने संरक्षित किसानों की आर्थिक स्थिति का अध्ययन करे और ऐसे विद्यालय खोले जिनमें किसानों के बच्चों के साथ-साथ वह अपने खुद के बच्चों को भी पढ़ाए. …जो गैर-जरूरी इमारतें वह अपनी मौज के लिए रखता है, उनका उपयोग अस्पताल, स्कूल या ऐसी ही बातों के लिए करे. यदि पूंजीपति वर्ग काल का संकेत समझकर संपत्ति के बारे में अपने इस विचार को बदल डाले कि उस पर इस वर्ग का ईश्वर-प्रदत्त अधिकार है, तो जो सात लाख गांव आज घूरे कहलाते हैं, उन्हें आनन-फानन में शांति, स्वास्थ्य और सुख के धाम बनाया जा सकता है.’

अंत में उन्होंने लिखा था- ‘केवल दो मार्ग है जिनमें से हमें अपना चुनाव कर लेना है. एक तो यह कि पूंजीपति अपना अतिरिक्त संग्रह स्वेच्छा से छोड़ दें और उसके परिणामस्वरूप सबको वास्तविक सुख प्राप्त हो जाए. दूसरा यह कि अगर पूंजीपति समय रहते न चेते तो करोड़ों जाग्रत किंतु अज्ञानी और भूखे रहनेवाले लोग देश में ऐसी गड़बड़ी मचा देंगे कि एक बलशाली हुकूमत की फौजी ताकत भी उसे नहीं रोक सकेगी.’

यह लिखा था गांधी ने आज से लगभग 90 साल पहले. लेकिन यदि आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और रहन-सहन के मामले में दलितों, आदिवासियों और किसानों के एक बड़े हिस्से की तुलना देश के अन्य धनशाली वर्गों के साथ की जाए, तो स्थिति में कोई विशेष बदलाव नहीं हुआ है. बल्कि कई मामलों में तो यह खाई चौड़ी ही होती जा रही है. भारत में एक गंभीर और देशव्यापी आंतरिक अशांति की आहट सुनाई पड़ रही है. यह अलग-अलग रूपों में छिटपुट ढंग से लगातार प्रकट होती रही है. देश में एक मजबूत और विवेकशील राजनीतिक विपक्ष के अभाव से यह स्थिति और भी विकराल रूप ले सकती है. लेकिन व्यवस्था-मात्र के प्रति बढ़ता यह अविश्वास शायद सरकारों, पूंजीपतियों और मीडिया के एक बड़े हिस्से को मानो दिखाई-सुनाई ही नहीं दे रहा है.

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